रेखा गूंगी गुड़िया नहीं हैं

jab-top-mukabil-ho1कुछ लोगों का व्यक्तित्व आग की तरह होता है. वे जहां जाते हैं या तो लोगों को तपिश का अनुभव कराते हैं या झुलसा देते हैं और जिन्हें झुलसा नहीं पाते, उन्हें जला देते हैं. रेखा एक आग का नाम है और रेखा का संपूर्ण व्यक्तित्व ऐसा ही व्यक्तित्व है. रेखा राज्यसभा की मनोनीत सदस्य हैं. किसने उनका नाम सोनिया गांधी को सुझाया, अभी तक बात सा़फ नहीं हो पाई है. बस इतना पता चला है कि एक महिला हैं, जो राजनीति में नहीं हैं, उनकी सलाह पर रेखा को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया है. रेखा को राज्यसभा सदस्य बनाने से दो निशाने सधे. पहला निशाना, अमिताभ बच्चन और उनकी पत्नी जया बच्चन को यह संदेश भेजा गया कि आप अगर हमारे साथ नहीं हैं तो कोई बात नहीं, आपके दुश्मन हमारे साथ हैं. दूसरी तऱफ देश में उन्होंने यह संदेश भेजा कि उन्हें सही व्यक्तित्व का चुनाव करना कम से कम फिल्म क्षेत्र से आता है.

अभी तक फिल्मों से जितने भी मनोनयन हुए हैं, वे सारे नाम ऐसे हैं, जो मनोनयन योग्य थे और रेखा भी उनमें से एक हैं. रेखा राज्यसभा में आईं और संयोगवश वे सभी सदस्य उस दिन राज्यसभा में उपस्थित थे, जो अक्सर राज्यसभा में उपस्थित नहीं रहते हैं. घूम-घूमकर चोर निगाहों से रेखा को देखना, गैलरी में बैठे लोगों के लिए एक कौतूहल का विषय बन गया था. रेखा ग्यारह बजे स्मृति ईरानी के साथ राज्यसभा में पहुंचीं. हर सदस्य उनकी तऱफदेख रहा था, कुछ आंखें फाड़े, कुछ मुस्कुराती आंखों से और कुछ ऐसे, जैसे उन्होंने ग्लैमर की देवी को देख लिया हो. सेंट्रल हॉल में जब मैंने सत्यव्रत चतुर्वेदी से पूछा, आप का़फी मुड़-मुड़कर रेखा को देख रहे थे तो उनका जवाब था कि भाई, उनकी फिल्में देखने के लिए लोग दौड़-दौड़ कर जाते हैं और ब्लैक में टिकट ख़रीदते हैं और जब वह राज्यसभा में आ गई हैं और हमारे साथ बैठी हैं तो हम क्यों न देखें? यह जवाब एक मासूम जवाब है और सचमुच, रेखा के लिए या रेखा को देखने की उत्सुकता भरे सवाल का सत्यव्रत चतुर्वेदी द्वारा दिया गया जवाब सारे सांसदों का जवाब माना जाना चाहिए.

बहुत सालों के बाद राज्यसभा देश में चर्चा का विषय बनी है. अफसोस स़िर्फ इस बात का है कि अगर राज्यसभा चर्चा का विषय देश की बेकारी, महंगाई, भुखमरी, बेरोज़गारी, दु:ख, आंसू और तकलीफ पर चिंता की वजह से बनती तो उसका स्वागत हम अलग तरह से करते, लेकिन वह चर्चा का विषय रेखा के आने, रेखा के बैठने, रेखा की साड़ी, रेखा के कान के झुमके, जया बच्चन के तनाव भरे चेहरे और जया बच्चन के नाक पोंछने की वजह से बनी. इसके लिए भी राज्यसभा की तारी़फ करनी चाहिए, क्योंकि यह राज्यसभा के बदलते हुए चरित्र का प्रतीक है.

अफसोस इस बात का है कि राज्यसभा टीवी ने रेखा के शपथ ग्रहण समारोह को दो महिलाओं की आपसी तनातनी में बदल दिया. यह काम दूरदर्शन, लोकसभा, राज्यसभा से अलग वे चैनल करते, जो इस खेल में माहिर हैं तो कोई अफसोस न होता, क्योंकि यह उनका काम था, लेकिन यह काम राज्यसभा टीवी ने किया. उसने एक कैमरा रेखा पर लगाया और दूसरा जया बच्चन पर. जया बच्चन टेंशन में थीं. जया बच्चन को मालूम था कि अगर वह मुस्कुराएंगी तो देश में यह माना जाएगा कि वह मज़ाक में मुस्कुरा रही हैं और अगर वह गंभीर रहेंगी तो यह माना जाएगा कि रेखा का राज्यसभा में आना शायद उन्हें बहुत अच्छा नहीं लगा. शायद जया बच्चन ने गंभीर रहना ज़्यादा उचित समझा. जया बच्चन को यह नहीं मालूम कि गंभीर रहते हुए उन्होंने एक छोटी सी हरकत की, जिसे लोकसभा एवं राज्यसभा के गंभीर सांसदों ने देखा और महसूस किया. भारतीय जनता पार्टी के सांसद शाहनवाज़ हुसैन ने मुझसे कहा, ज़रा किसी साइको एनालिस्ट से पूछिए कि जब रेखा शपथ ले रही थीं तो जया बच्चन बार-बार अपनी नाक क्यों पोंछ रही थीं. शाहनवाज़ हुसैन इतनी गंभीरता से रेखा और जया बच्चन को देख रहे होंगे, मुझे अंदाज़ा नहीं था. मैंने शाहनवाज़ हुसैन से कहा, मैं कोशिश करूंगा, लेकिन मुझे लगा कि शाहनवाज़ हुसैन जैसे लोगों की भी साइको एनालिसिस होनी चाहिए कि वे जया बच्चन के नाक पोंछने को इतना गंभीर या फिर विश्लेषण योग्य क्रिया क्यों मान बैठे.

राज्यसभा इसलिए बनी है, ताकि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ राज्यसभा में जाएं और देश की उन समस्याओं के बारे में बातचीत करें, जिन्हें लोकसभा अपनी चर्चा का विषय नहीं बनाती. दूसरी बात यह कि लोकसभा जिन विषयों पर चर्चा करती है, उन विषयों पर कहां कमी रह गई, उस चर्चा में कहां खामी रह गई, उसे भी राज्यसभा उजागर करे. राज्यसभा अपनी इस ज़िम्मेदारी को कितना और किस तरह निभाती है, इस पर तो हमें कुछ नहीं कहना, लेकिन हम इतना ज़रूर कहना चाहेंगे कि बहुत सालों के बाद राज्यसभा देश में चर्चा का विषय बनी है. अफसोस स़िर्फ इस बात का है कि अगर राज्यसभा चर्चा का विषय देश की बेकारी, महंगाई, भुखमरी, बेरोज़गारी, दु:ख, आंसू और तकलीफ पर चिंता की वजह से बनती तो उसका स्वागत हम अलग तरह से करते, लेकिन वह चर्चा का विषय रेखा के आने, रेखा के बैठने, रेखा की साड़ी, रेखा के कान के झुमके, जया बच्चन के तनाव भरे चेहरे और जया बच्चन के नाक पोंछने की वजह से बनी. इसके लिए भी राज्यसभा की तारी़फ करनी चाहिए, क्योंकि यह राज्यसभा के बदलते हुए चरित्र का प्रतीक है. राज्यसभा में सचिन तेंदुलकर का मनोनयन देश में विवाद का विषय बन गया. विवाद का विषय नहीं बनना चाहिए. हालांकि कांग्रेस ने सचिन तेंदुलकर को इसलिए राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत कराने का निर्णय लिया, क्योंकि सरकार सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न नहीं देना चाहती थी. अब इस मनोनयन के बाद सचिन को भारत रत्न न दिया जाना लगभग पक्का हो गया है.

फिर रेखा के ऊपर आते हैं. रेखा जैसी लड़की सैकड़ों सालों में पैदा होती है. पारिवारिक तनाव, मां-बाप का अलगाव, जिस लड़की ने बचपन कभी जाना ही न हो. मुझसे एक बार रेखा ने बहुत मायूस शब्दों में कहा था कि 12-13-14 साल की उम्र में किशोरावस्था क्या होती है, मैंने जाना ही नहीं. मेरा बचपन बीता और मैं सीधे जवान हो गई. किशोरावस्था की शरारतें, किशोरावस्था के सपने और किशोरावस्था का चुलबुलापन जैसी चीज़ें मेरी ज़िंदगी में कभी आई ही नहीं. ऐसी लड़की, जिसने सी ग्रेड की फिल्मों से अपना करियर शुरू किया हो, वह ए ग्रेड की फिल्मों की हीरोइन बनी. उन्होंने अपने पूरे व्यक्तित्व को इस तरह से विकसित किया कि आज इस उम्र में भी वह जहां चली जाती हैं, वहां चाहे कितनी ही करीना कपूर हों, कितनी भी कैटरीना कैफ हों, रेखा अलग दिखाई देती हैं और रेखा का व्यक्तित्व उन सब पर भारी पड़ जाता है. उम्र जैसे आकर रेखा के ऊपर रुक गई है. उम्र ही नहीं, शोहरत भी रेखा के पास आकर ठहर गई है. मैंने एक बार उनसे पूछा था, रेखा, किससे शादी करना चाहेंगी? रेखा ने मेरी तऱफ आंख उठाकर कहा था, क्या रेखा पागल है, जो किसी से शादी करेगी. इस दुनिया में कोई शख्स ऐसा नहीं है, जो रेखा को सह सके, जो रेखा को संभाल सके. यह वह दौर था, जब रेखा के किस्से किसी एक शख्स के साथ चारों तऱफ फिजाओं में गूंजते रहते थे. रेखा ने जो कहा, शायद वह सच था, रेखा की ज़िंदगी में कोई पुरुष स्थाई तौर पर आ ही नहीं सका. रेखा का कहना सही था. रेखा में वह आग है, जिसे कोई पुरुष सह ही नहीं सकता. कहानियों में एक पुरुष है, लेकिन वह भी शायद अगर रेखा के साथ होता तो जल कर भस्म हो गया होता. रेखा को हवाएं, बादल, चिड़ियों की चहचहाहट, सूरज का डूबना और सूरज का उगना बहुत पसंद है. रेखा से किए गए मेरे रविवार अख़बार के दिनों के तीन इंटरव्यू आज भी हिंदी पढ़ने वालों के दिमाग़ में ताजा हैं. जब मुझे कोई भी साथी मिलता है तो मेरी बाक़ी रिपोर्टों के साथ-साथ मेरे रेखा के साथ इंटरव्यू को ज़रूर याद करता है.

रेखा राज्यसभा में आई हैं तो मैं राज्यसभा के सांसदों को बस एक बात बताना चाहता हूं कि रेखा स़िर्फ ग्लैमर नहीं हैं, रेखा की समझदारी का कोई जवाब नहीं है. रेखा की पैनी नज़र राजनेताओं पर तो नहीं रहती, लेकिन राजनेताओं द्वारा पैदा की गई समस्याओं पर रहती है. इसके बारे में कई बार रेखा ने बातचीत की है. देश के हालात से रेखा चिंतित हैं. रेखा अब जब राज्यसभा में आई हैं तो यह अपेक्षा करनी चाहिए कि वह उन लोगों को भी बोलने की प्रेरणा देंगी, जो छह साल तक राज्यसभा में रहने के बाद भी कुछ नहीं बोलते हैं. सदस्य बनते हैं, शपथ लेते हैं और विदाई समारोह में अपने लिए अच्छी बातें सुनकर चले जाते हैं. राज्यसभा को ऐसे लोगों का कोई फायदा नहीं मिलता, लेकिन रेखा ऐसी नहीं हैं. रेखा राज्यसभा में जब बोलेंगी तो हो सकता है कि राज्यसभा में कुछ ज़्यादा हलचल हो. ज़्यादा हलचल इसलिए होगी, क्योंकि एक बात का मुझे एहसास है कि कहीं रेखा के बोलने से जया बच्चन देश के हालात पर उनसे पहले न बोल उठें.

इसमें कोई दो राय नहीं कि हम तमाशा देखने के आदी हैं, इसलिए हमारे जेहन में रेखा और जया बच्चन के बीच कोई तमाशा हो, इसका इंतज़ार है. शायद इसीलिए हर एक टीवी चैनल ने इस एक शब्द का इस्तेमाल किया है, सिलसिला, रेखा और जया का सिलसिला, राज्यसभा में भी सिलसिला. यह ग़लत मानसिकता है. रेखा रेखा हैं, जया जया हैं. रेखा को न जया बच्चन के साथ देखना चाहिए और न जया बच्चन से रेखा की तुलना करनी चाहिए. दोनों अपनी-अपनी तरह से ज़िंदगी में करिश्मे कर चुकी हैं. आशा करनी चाहिए कि जब दोनों राज्यसभा में हैं तो दोनों वहां करिश्मा करेंगी, सवालों पर बोलेंगी और उन लोगों को भी एक संदेश देंगी, जो सिनेमा में काम करने वाली लड़कियों या महिलाओं को गूंगी गुड़िया कहते हैं. आशा करनी चाहिए कि रेखा गूंगी गुड़िया नहीं बनेंगी.


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