राजनीतिक दलों ने लोकतंत्र को मज़ाक़ बना दिया

lokjtantraउत्तर प्रदेश के चुनाव में या फिर सभी पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में एक बड़ा सवाल उभर कर सामने आया है कि हम लोकतंत्र के प्रति संवेदनशील हैं भी या नहीं. चुनाव के व़क्त सभी पार्टियां अपना अच्छा चेहरा जनता के पास लाती हैं. अच्छा चेहरा लाने का मतलब होता है उनका घोषणापत्र, जिसमें वे झूठे ही सही, लेकिन वायदे करती हैं. उन वायदों में जहां एक तरफ आम लोगों को यह बताया जाता है कि पार्टी उनके लिए क्या करने वाली है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी यह भी दर्शाती है कि वह लोगों के प्रति कितनी ईमानदार और संवेदनशील है. अब धीरे-धीरे घोषणापत्रों का चलन लगभग बंद हो गया है. अब घोषणापत्र केवल रस्म अदायगी के लिए निकाले जाते हैं और चुनावों की घोषणा होने के बाद जब नामांकन पत्र भर दिए जाते हैं तो कुछ नेता इकट्ठे होकर उसे अ़खबार वालों को दिखा देते हैं और कह देते हैं कि हमने यह घोषणापत्र निकाला.

घोषणापत्र लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण दस्तावेज है. पार्टी जब चुनाव लड़ने की तैयारी करे तो जैसे ही चुनाव की घोषणा हो, उसे अपनी नीतियों के बारे में मतदाताओं को बताना चाहिए, ताकि वे यह समझ सकें कि पार्टियां जिन प्रत्याशियों का चयन कर रही हैं, वे प्रत्याशी उन नीतियों को जनता के हित में लागू करने वाले होंगे. राजनीतिक पार्टियां अब यह काम नहीं करतीं. वह ऐसा इसलिए नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें यह लगता है कि जनता का चुनाव घोषणापत्र में विश्वास नहीं है. दरअसल, राजनीतिक पार्टियों को चलाने वाले चेहरे भी बदल गए हैं और दिमाग़ भी बदल गया है. एक दौर था, जब चुनाव घोषणापत्र बनाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ लोगों की एक समिति बनाई जाती थी, जो का़फी विचार-विमर्श के बाद यह तय करती थी कि पार्टी किन मुख्य मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करे, क्योंकि घोषणापत्र को पहले के नेता पार्टी की वचनबद्धता का दस्तावेज़ मानते थे. इसलिए बातें भी होती थीं और जनता में चर्चा भी होती थी कि इस दल ने अपने घोषणापत्र में अमुक विषय को प्राथमिकता दी और अमुक दल ने अपने घोषणापत्र में अमुक विषय को छुआ ही नहीं, लेकिन अब सचमुच दिमाग़ बदल गया है. राजनीतिक दलों का दिमाग बदलना, अपने विचार स्पष्ट न करना और जनता को मूर्ख समझना लोकतंत्र के लिए सही संकेत नहीं है.

वे सारे संस्थान, जो लोकतंत्र को बनाए रखने और विकसित करने के लिए ज़िम्मेदार हैं, अपनी पूरी शक्ति के साथ लोकतंत्र की एक नई परिभाषा गढ़ रहे हैं, जो लोकतंत्र को आम लोगों से दूर ले जाती है. पहले एक महीने का समय चुनाव प्रचार के लिए मिलता था और उस एक महीने के समय में देश के गली-मोहल्लों में, गांवों में चुनाव को लेकर बातचीत होती थी, बहस होती थी, चर्चाएं होती थीं. उम्मीदवार दरवाजे-दरवाजे जाता था, लोगों से उनकी परेशानियां पूछता था और अपनी अकर्मण्यता के लिए मा़फी भी मांगता था, पर इस बार का चुनाव तो अनूठा चुनाव है. इसमें औसतन 12 से 15 दिन उम्मीदवार को मिल रहे हैं, चुनाव प्रचार के लिए. राजनीतिक दल भी अपने उम्मीदवारों की सूची इस तरह घोषित कर रहे हैं, ताकि उन्हें चुनाव प्रचार में जाने का व़क्त कम से कम मिले. इसका परिणाम यह निकल रहा है कि जो चुनाव पहले लोकतंत्र का उत्सव हुआ करता था, अब वह लोकतंत्र का अभिशाप जैसा बन रहा है. पहले सुनते थे कि कुछ लोग होते थे, जो पैसा ले लेते थे, लेकिन अब तो अधिकांश जगहों पर हर  मतदाता को खरीदने की कोशिश उम्मीदवार कर रहे हैं. अगर मनीऑर्डर से हर घर में पैसा भेजा जाए, ग़लत आईडेंटिटी बताकर, तो इसे आप क्या कहेंगे? जनता देखकर अचंभित है कि संदेहास्पद गाड़ियों की चेकिंग में करेंसी नोट निकल रहे हैं. हालांकि इन करेंसी नोटों में बहुत सारे नोट नकली होते हैं, वे चाहे पांच सौ के हों या हजार के. लोग यह जान ही नहीं पाते कि उनके पास जो पैसा पहुंचाया जा रहा है, वह असली है या नक़ली. इसी का सहारा लेकर हमारी अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने की साजिश वे लोग कर रहे हैं, जिन्हें इस देश की अर्थव्यवस्था से कोई प्यार नहीं है. लोकतंत्र के उत्सव को समाप्त करना हिंदुस्तान में लोकतंत्र को सवालिया दायरे में खड़ा करने जैसा है. आज मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग 18 से 25 साल के बीच का है. इस वर्ग ने पिछले 25 सालों में लोकतंत्र को लेकर शंकाएं ही शंकाएं देखी हैं. इस वर्ग ने देखा है कि आम लोगों के अधिकार कैसे छीने जाते हैं, थाली में से रोटी कैसे समाप्त होती है, कैसे जनता की समस्याओं को अनदेखा किया जाता है. खासकर उस वर्ग का अपना हित, जिसमें सबसे ज़्यादा है रोजगार. रोज़गार की बात तो चुनाव के दौरान अब उठती ही नहीं. 18 से 25 साल का यह नौजवान तबका लोकतंत्र को अभिशाप मानने लगेगा. यह वर्ग नहीं जानता कि चुनावों में कैसे टिकट बंटते हैं, निर्णय प्रक्रिया क्या होती है, प्रचार कैसे होता है और वोट कैसे पड़ते हैं.

पार्टी जब चुनाव लड़ने की तैयारी करे तो जैसे ही चुनाव की घोषणा हो, उसे अपनी नीतियों के बारे में मतदाताओं को बताना चाहिए, ताकि वे यह समझ सकें कि पार्टियां जिन प्रत्याशियों का चयन कर रही हैं, वे प्रत्याशी उन नीतियों को जनता के हित में लागू करने वाले होंगे. राजनीतिक पार्टियां अब यह काम नहीं करतीं. वह ऐसा इसलिए नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें यह लगता है कि जनता का चुनाव घोषणापत्र में विश्वास नहीं है.

जब हिंदुस्तान में लोकतंत्र अंगड़ाई ले रहा था, तबसे लेकर 1980 तक इस देश के विश्वविद्यालयों में संपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया का पालन होता था. राजनीतिक दलों के संगठन होते थे, जो लगभग स्वायत्त होते थे. उनमें वैसी ही परंपरा थी, जैसी उनके मूल दल में अपनाई जाती थी. जिस तरह राजनीतिक पार्टियों में उम्मीदवारों के नाम मांगे जाते थे, छात्रसंघों के चुनाव में भी छात्र संगठन, युवा संगठन नाम मांगते थे, पार्लियामेंट्री बोर्ड बैठता था, जो उन नामों पर बहस करता था और उसके बाद उनमें से कुछ लोगों को अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री एवं मंत्री जैसे पदों के लिए चुनता था. उस दौर के संगठन थे युवक कांग्रेस, समाजवादी युवजन सभा, ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद. ये चारों संगठन ईमानदारी के साथ संपूर्ण प्रक्रिया का पालन करते थे और इस दौरान विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते थे तथा हिस्सा बनने के कारण उनमें राजनीतिक दक्षता भी आ जाती थी. चुनावों में भाग लेने की एक अनिवार्य शर्त होती थी कि उस उम्मीदवार ने वैचारिक शिविरों में हिस्सा लिया है कि नहीं. युवक कांग्रेस, समाजवादी युवजन सभा, ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अलावा दूसरे राजनीतिक दलों के भी छात्र-युवा संगठन हुआ करते थे. वे भी वैचारिक शिविर चलाते थे, जिनमें देश की समस्याओं की जड़ के ऊपर बहस होती थी. उन बहसों में पार्टी के बड़े नेता बुलाए जाते थे और उन्हें छात्रों के सवालों का सामना करना पड़ता था. नेता भी संभल कर आते थे कि यह हमारी नौजवान पीढ़ी, जिसे कल हमारी जगह लेनी है, इसका दिमाग़ खुला होना चाहिए और वैचारिक शक्ति से ओतप्रोत भी होना चाहिए, लेकिन वह सारी प्रक्रिया सन्‌ सतहत्तर के बाद बंद हो गई. यह कहा जा सकता है कि सन्‌ सतहत्तर के आंदोलन में जितने छात्रनेता शरीक थे, वे सब सन्‌ सतहत्तर से अस्सी के बीच में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन गए. बहुत सारे विधायक बन गए, कुछ मंत्री बन गए, बाद में कुछ मुख्यमंत्री भी बन गए, केंद्र में मंत्री बन गए और इन लोगों ने जानबूझ कर भारत के विश्वविद्यालयों से इस प्रक्रिया का समापन करा दिया. अगर एक लाइन में कहा जाए तो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ की परंपरा ़खत्म करने के लिए वही लोग जिम्मेदार हैं, जो इस प्रक्रिया की वजह से आज भारत की राजनीति में शीर्ष स्थान पर हैं.

इतना बड़ा अहित लोकतंत्र का आज तक नहीं हुआ और अभी जो चुनाव हो रहे हैं, उनमें यह सा़फ देखा जा सकता है कि राजनीतिक दल चुनावी प्रक्रिया का सही इस्तेमाल ही नहीं कर रहे हैं. घोषणापत्र तो एक तरफ, वे अपने कार्यकर्ताओं को भी अनदेखा कर रहे हैं. जिस कार्यकर्ता ने 10 साल, 15 साल लोगों के बीच में काम किया, वह अब टिकट नहीं पाता. टिकट पाने वाला कोई सड़क का ठेकेदार, कोई शराब का ठेकेदार, कोई बड़ा जमींदार और वह, जिसमें किसी भी तरह से कमाए हुए पैसे को बड़े रूप में पार्टी नेताओं को देने की क्षमता हो, उम्मीदवार बनता है. इसलिए अब राजनीतिक पार्टियों को राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं मिल रहे हैं. अब हर राजनीतिक कार्यकर्ता अगर किसी उम्मीदवार की गाड़ी पर बैठता है तो वह एक हज़ार रुपये प्रतिदिन के हिसाब से अपनी कीमत लेता है, खाना-पीना लेता है, पान-तंबाकू और सिगरेट लेता है और रात में शराब भी लेता है. इसके बावजूद वह बहुत ईमानदारी के साथ चुनाव प्रचार करता हो, ऐसा भी नहीं है. अब राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में दिहाड़ी वाले कार्यकर्ता उपलब्ध होने लगे हैं और भारतीय लोकतंत्र की इस दु:खद स्थिति के लिए ज़िम्मेदार अगर कोई है तो यही दिहाड़ी वाले कार्यकर्ता हैं. अब कार्यकर्ता अपने दल को जिताने के लिए जी-जान से नहीं लगता, जीते या हारे, यह उम्मीदवार की किस्मत. कार्यकर्ता या दिहाड़ी वाले तथाकथित कार्यकर्ता को तो अपने रोज़ाना के पैसों से ही मतलब रहता है. इसलिए अब चुनावों में वे सवाल निर्णय का विषय नहीं बन रहे हैं, जिनसे आम लोगों की ज़िंदगी का रिश्ता है. बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, महंगाई, शिक्षा का टूटा हुआ तंत्र, चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था, बच्चों की कुपोषण से होने वाली मौतें, बाढ़, सूखा और राहत कार्यों में होने वाली लूट-खसोट जैसे सवाल अब राजनीतिक पार्टियां बहस में नहीं लातीं. इसलिए चुनाव होते हैं, लोग वोट देते हैं और जो सरकारें बनती हैं, वे भी इन सवालों को हल करने में कोई रुचि नहीं दिखातीं. पांच राज्यों में होने वाले चुनाव एक खतरनाक संकेत और दे रहे हैं. किसी भी पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में किसान का मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं है. किसान अपनी ज़मीन के छीने जाने से नाराज़ हैं, उसे उसकी फसल की वाजिब कीमत नहीं मिलती, वह अपनी फसल सीधे बेच नहीं सकता, उसके बेटे को नौकरी नहीं मिलती, उसकी बेटी की शादी नहीं हो पाती, क्योंकि दहेज बहुत ज़्यादा मांगा जाता है. किसान क़र्ज़ में डूबता जाता है, क्योंकि फसल का रिश्ता आसमान की बारिश से है. बिजली आती नहीं, आती है तो पानी इतना नीचे ज़मीन में चला गया है कि सिंचाई के लिए उपलब्ध नहीं हो पाता. सरकार की यह प्राथमिकता है नहीं कि सिंचाई के पानी का इंतजाम हो, इसके बारे में वह सोचे भी.

वे सारे संस्थान, जो लोकतंत्र को बनाए रखने और विकसित करने के लिए ज़िम्मेदार हैं, अपनी पूरी शक्ति के साथ लोकतंत्र की एक नई परिभाषा गढ़ रहे हैं, जो लोकतंत्र को आम लोगों से दूर ले जाती है. पहले एक महीने का समय चुनाव प्रचार के लिए मिलता था और उस एक महीने के समय में देश के गली-मोहल्लों में, गांवों में चुनाव को लेकर बातचीत होती थी, बहस होती थी, चर्चाएं होती थीं. उम्मीदवार दरवाज़े-दरवाज़े जाता था, लोगों से उनकी परेशानियां पूछता था और अपनी अकर्मण्यता के लिए मा़फी भी मांगता था, पर इस बार का चुनाव तो अनूठा चुनाव है.

पहले शहरों में पीने के पानी की किल्लत होती थी, अब हिंदुस्तान के गांव भी इस समस्या से परेशान हो गए हैं, लेकिन केंद्र सरकार या राज्य सरकारों के पास इस समस्या के बारे में सोचने के लिए समय तक नहीं है. इन सवालों के ऊपर अगर राजनीतिक दल आज नहीं सोचेंगे तो इसका मतलब है कि वे पांच राज्यों के चुनाव के ज़रिए हिंदुस्तान के लोगों को यह संदेश दे रहे हैं कि आपकी कोई भी समस्या हो, हम उसकी तरफ कभी देखेंगे भी नहीं. इसलिए जब अपराध बढ़ता है, लूट बढ़ती है, छीनाझपटी होती है, डकैतियां पड़ती हैं तो क़ानून व्यवस्था की बात कहकर एक नए तरह के भ्रष्टाचार को जन्म दिया जाता है और फिर पुलिस उस इलाके में नई तरह की उगाही करती है. देश के 270 जिले नक्सलवाद की चपेट में हैं. इन ज़िलों में विकास में भ्रष्टाचार है, न्यायिक भ्रष्टाचार है, प्रशासनिक भ्रष्टाचार है, शिक्षा एवं स्वास्थ्य में भ्रष्टाचार है, जिसके खिला़फ इन ज़िलों के लोग खड़े हो रहे हैं. हमारे राजनीतिक दल शायद यह चाहते हैं कि पूरे देश के लोग इसी तरह खड़े हों और फिर वे उन्हें नक्सलवाद या उग्रवाद का नाम देकर गोलियों से भुनवा दें. दर्दनाक बात है, लेकिन बात सच है कि जिस किसान को उसकी फसल का वाजिब दाम नहीं मिलेगा, वह खेती करके क्या करेगा? उसकी ज़मीन अगर छीनी जाएगी तो वह जीवित कैसे रहेगा? इसलिए नक्सलवाद का एक नया चेहरा पनप रहा है. बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में अब नक्सलवादियों को पहाड़ों की ज़रूरत नहीं है, जंगलों की भी ज़रूरत नहीं है. अब नक्सलवादियों को उन्हीं जगहों पर अपने लिए ठिकाना मिल जाता है, जो कभी उनके लिए खतरनाक हुआ करती थीं. वे कभी ज़मीन मालिकों के खिला़फ हुआ करते थे, लेकिन अब ज़मीन मालिक ही उन्हें अपने यहां ठिकाना दे रहे हैं.

पांच राज्यों में होने वाले चुनाव सवालों के अलावा नए सिरे से सांप्रदायिकता को पैदा करने वाले हैं और शायद यह इशारा कर रहे हैं कि इस देश में सांप्रदायिक राजनीति खत्म नहीं हुई है. भारतीय जनता पार्टी द्वारा उत्तर प्रदेश के चुनाव घोषणापत्र में यह कहना कि वह राम मंदिर बनाएगी, यही संकेत करता है और दूसरा संकेत भारतीय जनता पार्टी यह कर रही है कि वह अब अपनी एक ऐसी लाइन तय कर रही है, जिसे मानने वाले ही उसके साथ एनडीए में बैठ पाएंगे, अन्यथा नहीं. जदयू शायद अब भारतीय जनता पार्टी से दूर चला गया है, क्योंकि वही अकेला ऐसा दल था, जिसने भारतीय जनता पार्टी को रामजन्म भूमि, धारा 370 और कॉमन सिविल कोड जैसे सवालों पर घेर रखा था,  लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने यह फैसला कर लिया है कि वह जदयू जैसे दलों से छुटकारा पा लेगी. अन्यथा वह इस लाइन को अपने चुनाव घोषणापत्र में न डालती. कांग्रेस ने यह तय कर लिया है कि उसे इस चुनाव में जीत या हार की कोई विशेष चिंता नहीं है, क्योंकि उसका दांव स़िर्फ उत्तराखंड और पंजाब पर है और सारे राज्यों में अकेला पंजाब है, जहां उसकी सरकार बनने की संभावना ज़्यादा है. उत्तराखंड में जीती हुई बाजी कैसे हारते हैं, इसे कांग्रेस ने दिखा दिया है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कोई पुरसाहाल नहीं है. जिस प्रदेश में राहुल गांधी ज़िलों-ज़िलों में घूमकर प्रचार कर रहे हैं, वहां मुख्यमंत्री कौन होगा, इसका ऐलान कांग्रेस के एक मंत्री सलमान खुर्शीद करते हैं. उन्होंने अगले मुख्यमंत्री के तौर पर प्रमोद तिवारी का नाम घोषित कर दिया है. राहुल गांधी अपने काम करने के तरीके से यह बता रहे हैं कि बेनी प्रसाद वर्मा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे. समझौतों की पेंगे बढ़ाई जा रही हैं, लेकिन मुख्य सवाल यह है कि आम आदमी के सवाल क्या चुनाव के इस नक्कारखाने में खो जाएंगे, उसकी आवाज सुनी नहीं जाएगी या तब सुनी जाएगी, जब हज़ारों लोग कोई रास्ता रोक लें या किसी अधिकारी को बंधक बना लें या फिर हिंसा पर उतर आएं, जला डालें, तहस-नहस कर डालें? यह डर उन सबको है, जो लोकतंत्र के समर्थक हैं, इस देश में लोकतंत्र को बनाए रखना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश के चुनाव में ममता बनर्जी अपने उम्मीदवारों को खड़ा कर रही हैं. अभी तक यह सा़फ नहीं हो पाया है कि वह प्रचार करेंगी या नहीं, लेकिन उन्होंने यह संकेत ज़रूर दे दिया है कि वह उसी तरह यूपीए से दूर जा रही हैं, जिस तरह जदयू एनडीए से.

संभावना इस बात की थी कि नीतीश कुमार और ममता बनर्जी मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार करेंगे, लेकिन ममता बनर्जी हिम्मत नहीं जुटा पाईं. उन्हें लगा कि अगर वह ऐसा करती हैं तो कांग्रेस उनके खिला़फ ज़्यादा हमलावर हो जाएगी और किसी न किसी बहाने उनकी सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करेगी. लेकिन ममता का यूपीए और नीतीश का एनडीए से दूर होना एक नया संकेत दे रहा है और एक नए तरह के धु्रवीकरण की ओर इशारा कर रहा है, जहां एक तरफ मुलायम सिंह यादव, लालू यादव एवं रामविलास पासवान कांग्रेस की तरफ जाते दिखाई दे रहे हैं, वहीं छोटे दल ममता बनर्जी और नीतीश कुमार के साथ आते दिख रहे हैं. शायद उत्तर प्रदेश का चुनाव इस बात को भी तय करेगा कि ममता बनर्जी और नीतीश कुमार आम लोगों के सवाल उठाने की हिम्मत भी कर पाते हैं या नहीं. इन पांच राज्यों के चुनाव से एक और निराशा झलकती है. अक्सर जब चुनाव होते हैं तो कार्यकर्ताओं के बीच से ही कोई एक व्यक्ति आगे बढ़कर नेतृत्व की तरफ चार क़दम बढ़ाता है, पर अब कार्यकर्ताओं का कोर्ई रोल नहीं है और न चुनाव में प्रचार की वह भूमिका रही, जिसकी वजह से प्रदेश में रहने वाला हर व्यक्ति चुनाव प्रक्रिया में शामिल हो जाता था. इस बात का खतरा पैदा हो गया है कि व़क्त के साथ लोगों को यह लगने लगे कि कहीं यह लोकतंत्र फिजूल की चीज तो नहीं है. वे सारे लोग बहुत निराश हैं,जो लोकतंत्र से प्यार करते हैं, जो इस देश में अमन-चैन चाहते हैं, विकास चाहते हैं, इस देश को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं. पर ऐसा लगता है कि अब ये बातें सपना ही बनी रहेंगी और हम अपनी आंखों के सामने लोकतंत्र को अपराधियों के हाथों में जाता हुआ देखेंगे, क्योंकि हर दल ने अपराधियों को टिकट देने में काफी दरियादिली दिखाई है, दिल खोलकर अपराधियों को टिकट दिए गए हैं. डर इस बात का है कि कहीं जनता ही यह न सोच ले कि ये ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो हमारे हितों के खिला़फ खड़े हैं तो हम क्यों इनके लिए खड़े हों. अगर कहीं ऐसा हो गया तो जो चुनाव लोकतंत्र को मज़बूत बनाए रखने की गारंटी होते हैं, वही लोकतंत्र को समाप्त करने की दिशा में बढ़ने वाले क़दम के रूप में जाने जाएंगे.


    Leave a Reply