माननीय उपराष्ट्रपति जी ने अपने संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य का पालन नहीं किया. क्यों नहीं किया, ये सवाल हम उपराष्ट्रपति जी से विनम्रता से पूछना चाहते हैं. क्या हम उपराष्ट्रपति जी से ये पूछ सकते हैं कि उनके कर्तव्य पालन न करने के पीछे कहीं ये कारण तो नहीं है कि वे मुसलमान हैं और उन्हें लगा हो कि छद्म हिन्दूवादी उनके पीछे पागलों की तरह पड़ जाएंगे. या फिर ये कि जो पत्र उन्हें दिया गया है, उस पत्र में देश के वित्त मंत्री रहे हुए व्यक्ति का नाम है, जो इस समय उनसे ऊंचे पद पर आसीन है. या फिर ये कि उसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का नाम है और आने वाले संभावित मुख्य न्यायाधीश का नाम है. या फिर ये कि उनके सभापतित्व में चलने वाली राज्यसभा के कुछ भूतपूर्व सदस्यों के नाम हैं और कुछ वर्तमान सदस्यों के भी नाम हैं.
उपराष्ट्रपति जी के कर्तव्य पालन में खरा न उतरने का परिणाम भविष्य में शायद ये निकले कि कभी कोई राष्ट्रपति, कभी कोई प्रधानमंत्री, कभी कोई मुख्य न्यायाधीश या कभी कोई उपराष्ट्रपति अगर आत्महत्या करे और मृत्यु से पहले अपना आखिरी बयान छोड़ कर जाए, तो उसके ऊपर भी कोई कार्रवाई नहीं होगी. क्योंकि ईश्वर न करे, लेकिन व्यवस्था मिलकर उनके मृत्यु पूर्व बयान को दबा देगी. एक फिल्म अभिनेत्री जिया खान आत्महत्या करती है, पूरा सिस्टम नामजद लोगों के पीछे ईमानदारी से पड़ जाता है. लेकिन इस देश में पच्चीस साल तक विधानसभा का सदस्य रहने वाला व्यक्ति, जो वित्त मंत्री रहा और फिर बाद में मुख्यमंत्री बना, उसने मुख्यमंत्री निवास में आत्महत्या कर ली, आत्महत्या से पूर्व 60 पृष्ठ का खत लिखा, एक दस्तावेज लिखा, जिसे उसने ‘मेरे विचार’ का शीर्षक दिया, लेकिन उसकी जांच नहीं हुई. सारे कागज देखने पर पुलिस की रिपोर्ट में ये साफ संकेत है कि भूतपूर्व मुख्यमंत्री की आत्महत्या के पीछे के कारण उनके द्वारा छोड़े गए दस्तावेज में मौजूद हैं. लेकिन खुद पुलिस ने उसकी कोई जांच नहीं की. ये कैसा कमाल है कि राज्य सरकार ने केन्द्र को सिफारिश भेजी कि वो जैसी जांच चाहे वैसी जांच करवा ले, लेकिन केन्द्र ने सीबीआई की जांच का आदेश अबतक नहीं दिया है. देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मृत मुख्यमंत्री की विधवा मिलीं. उन्होंने कहा कि चार-पांच दिन के बाद मैं इसका अध्ययन करूंगा. लेकिन मार्च के बाद से अब तक उनके वो चार-पांच दिन पूरे नहीं हुए. मृत मुख्यमंत्री की विधवा प्रधानमंत्री से मिलने का आज तक समय मांग रही हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के पास उनसे मिलने का समय नहीं है.
मैं अरुणाचल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल की बात कर रहा हूं. पुल ने मुख्यमंत्री आवास में आत्महत्या की. उन्होंने 60 पृष्ठ का मौत पूर्व दस्तावेज लिखा. उस दस्तावेज में उन्होंने हर पृष्ठ पर अपने दस्तखत किए. फुट नोट पर कुछ लिखा और मरने से पहले उसके सारे पन्ने आसपास फैला दिए, ताकि वो अनदेखा न रह जाए. उन्होंने मृत्यु पूर्व बयान में ये आशा व्यक्त की कि इस पत्र में भ्रष्टाचार की जो कहानी लिखी है, उसके ऊपर जनता ध्यान देगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज उठाएगी. भ्रष्टाचार की उस कहानी में उनकी पार्टी के राज्यसभा के सदस्य, बड़े वकील और सुप्रीम कोर्ट के जजों के प्रतिनिधि शामिल हैं. उसमें इसका संपूर्ण विवरण शामिल है कि राज्य में जो पैसा आता है, वो पैसा कैसे जनता के पास नहीं पहुंचता और उस पैसे की कैसे लूट हुई है. लेकिन कलिखो पुल को क्या मालूम था कि उन्हीं के साथी, उन्हीं की बिरादरी के राजनीतिज्ञ उनके इस मृत्यु पूर्व बयान को उस जगह पहुंचा देंगे, जहां से इसकी कहीं झलक भी नहीं आ पाएगी. उन्हें क्या पता था कि इस देश का मीडिया इस तरह के सवालों पर ध्यान नहीं देगा. श्री पुल को शायद ये भी नहीं पता था कि जिस राज्य में भारतीय जनता पार्टी का कोई नामलेवा नहीं था और जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने में उन्होंने जितनी मेहनत की, उसी सरकार और केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री उनकी मौत पर आंसू तो नहीं ही गिराएंगे, बल्कि उनकी पत्नी को मिलने का समय भी नहीं देंगे.
उनकी पत्नी ने उपराष्ट्रपति महोदय को अपना विस्तृत विवरण दिया, क्योंकि वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास नहीं जा सकतीं. कलिखो पुल के मृत्यु पूर्व बयान में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री प्रणब मुखर्जी जी का नाम है. उनके कोलकाता के घर का पता है, जहां उन्होंने उन्हें पैसे दिए. श्री प्रणब मुखर्जी आज देश के राष्ट्रपति हैं, उनकी पत्नी उनके पास नहीं जा सकती थीं, इसलिए वे उपराष्ट्रपति महोदय के पास गईं.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का नाम कलिखो पुलो ने मृत्यु पूर्व वक्तव्य में लिखा है. सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को अप्राकृतिक मौत देने की तैयारी कर ली थी, जो उनकी पत्नी ने खत के रूप में सुप्रीम कोर्ट में जमा कराया था. उन्होंने ये अनुमति मांगी थी कि जिन लोगों के नाम पुल के मृत्यु पूर्व बयान में हैं, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाए. लेकिन जब उन्हें पता चला कि उस पत्र की हत्या हो जाएगी, क्योंकि उस पत्र को ज्यूडिशियल याचिका में बदल दिया गया था. जिस तरह से याचिका की सुनवाई से एक दिन पहले शाम को रजिस्ट्रार के ऑफिस से उनके पास दिल्ली पहुंचने की सूचना फोन से दी गई, उससे उन्हें लगा कि उनको उस याचिका को वापस ले लेना चाहिए. इसके बाद वे सबसे वरिष्ठ उपलब्ध अधिकारी उपराष्ट्रपति के पास गईं और उन्हें सारी बातें बताते हुए, सारे कागज लगाकर ये कहा कि वे इसकी जांच कराएं. लेकिन उपराष्ट्रपति महोदय ने पता नहीं किन कारणों से, शायद ये वही कारण होंगे जिनका मैंने शुरू में जिक्र किया, उस फाइल को किसी के पास नहीं भेजा, लेकिन ये हमारा अंदाजा है. हम चाहते हैं कि उपराष्ट्रपति महोदय देश को ये बताएं कि उनके राज्यसभा के सदस्य जिनका नाम श्री पुल के मृत्युपूर्व नोट में है, क्या उन्होंने श्री पुल के उस नोट का खंडन किया है? क्या राज्यसभा भ्रष्टाचारी नेताओं को संरक्षण देने का अड्डा बन गई है? सुप्रीम कोर्ट की बेंच कहती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ कोई शिकायत है, तो राष्ट्रपति से अनुमति लेकर इसकी जांच कराई जा सकती है. लेकिन जब स्वयं राष्ट्रपति के पद पर आसीन व्यक्ति का नाम राष्ट्रपति के नाते नहीं, लेकिन किसी समय देश के वित्त मंत्री रहते हुए अगर आया हो, तो फिर उपराष्ट्रपति के अलावा इस पत्र को देने की कोई जगह बचती नहीं है. उपराष्ट्रपति जी ने संविधान और नैतिकता के सवाल को दरकिनार कर इस फाइल का क्या किया, उस पत्र का क्या किया, किसी को कुछ नहीं पता? क्या उपराष्ट्रपति जी संवैधानिक प्रमुख होने के नाते और राज्य सभा के सभापति होने के नाते देश को इसका कारण बताएंगे? सुप्रीम कोर्ट के फैसले, सुप्रीम कोर्ट की गतिविधियां, कुछ लोगों की वजह से सवालों के घेरे में आ गई हैं. खुद राज्यसभा सवालों के घेरे में आ गई है. क्या उपराष्ट्रपति जी इसकी जांच के लिए राज्यसभा की कोई समिति बनाएंगे या अपने संवैधानिक अधिकार के तहत एक एसआईटी गठित करने का आदेश गृहमंत्रालय को देंगे? ये सवाल है और बहुत बड़ा सवाल है.
आखिर सवालों के दायरे से बाहर कौन है? क्या स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. जब 2014 में उन्होंने सरकार बनाई, तो भारत को दिए गए उनके सबसे पहले वचनों में एक वचन था कि वे भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की पॉलिसी पर चलेंगे. उन्होंने शायद इसीलिए अपने मंत्रिमंडल के राजनीतिक सदस्यों की हैसियत कम की और नौकरशाहों की हैसियत ज्यादा बढ़ाई. यद्यपि भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला पहले का या उनके समय का, कानून के दायरे में अपने अंतिम परिणाम पर नहीं पहुंचा. लेकिन यहीं सवाल खड़ा होता है कि उनकी मदद करने वाले व्यक्ति, अरुणाचल के मुख्यमंत्री, जिन्होंने अरुणाचल में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी, उसकी सरकार बनवाई, कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई. उन्होंने मरते समय 60 पृष्ठ का एक लंबा नोट लिखा, जिसमें ये सब विस्तार से लिखा कि कहां-कहां भ्रष्टाचार होता है, कौन-कौन भ्रष्टाचार करता है. ये भी लिखा कि उनसे किसने पैसे मांगे, क्यों पैसे मांगे और सरकार की किन योजनाओं के लिए पैसे मांगे. वो खत, वो उनका मृत्यु स्वीकारोक्ति बयान, प्रधानमंत्री के पास जरूर पहुंचा होगा. प्रधानमंत्री ने क्यों उसके ऊपर ध्यान नहीं दिया. भ्रष्टाचार की परत-दर-परत खोलने वाला एक दस्तावेज, उसी राजनीतिक बिरादरी के मुख्यमंत्री ने लिखा था, जिस राजनीतिक बिरादरी से प्रधानमंत्री हैं. उस दस्तावेज का नोटिस प्रधानमंत्री जी ने क्यों नहीं लिया. वो भारतीय जनता पार्टी के भ्रष्टाचार की कहानी नहीं कह रहा है, वो तो कांग्रेस के भ्रष्टाचार की कहानी कह रहा है. उसमें भारतीय जनता पार्टी से जुड़े किसी भी व्यक्ति का नाम नहीं है. उसमें कांग्रेस से जुड़े सभी लोगों के नाम हैं. वो चाहे आज कितने भी बड़े पदों पर हों. राज्यसभा के जितने भी सदस्यों के नाम उसमें आए हैं, वो सब कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं. तब आखिर प्रधानमंत्री मोदी ने उस मृत्यु पूर्व बयान का संज्ञान क्यों नहीं लिया. क्यों प्रधानमंत्री ने उस बयान के आधार पर जांच नहीं बैठाई. क्यों प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट और राज्यसभा की ऐसी छवि बनने की इजाजत दे दी, मानो संपूर्ण सुप्रीम कोर्ट और संपूर्ण राज्यसभा भ्रष्टाचार के कीचड़ में नाक तक सनी है. अगर वे जांच करा देते, अगर वे एसआईटी बनवा देते, अगर वे सीबीआई को जांच सौंप देते, जिसमें निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट और राज्यसभा के सदस्य बरी हो जाते, तो कम से कम एक लाछंन धुल जाता. लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया. मैं आज भी मानता हूं कि प्रधानमंत्री साफ छवि के व्यक्तिगत रूप से ईमानदार व्यक्ति हैं. लेकिन उन्होंने क्या सोच कर स्वर्गीय पुल द्वारा लिखे गए उस 60 पृष्ठ के नोट को अनदेखा कर दिया और अनदेखा करने दिया.
मैं पूछता चाहता हूं, प्रधानमंत्री जी क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? मैं सर्वोच्च न्यायालय से भी पूछना चाहता हूं कि क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? मैं उपराष्ट्रपति जी से पूछना चाहता हूं कि क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? मैं राज्यसभा से भी पूछना चाहता हूं कि क्या हमारा सवाल उठाना गलत है? अगर आपको लगता है कि हमारा सवाल उठाना गलत है, तो क्या हम आपसे इन सवालों को उठाने के बदले सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगें. लेकिन मुझे लगता है कि इस भ्रष्ट व्यवस्था के जंगल में कुछ ऐसे लोग जरूर हैं, जो अन्याय, भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना हाथ खड़ा करेंगे. मैं इसीलिए आखिर में संवैधानिक रूप से उपराष्ट्रपति जी से सवाल करता हूं और ये अपेक्षा भी जाहिर करता हूं कि आप जा रहे हैं, जाते-जाते अपने संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य का पालन करेंगे. आपको श्रीमती पुल द्वारा भेजे गए 60 पेज के नोट के साथ उनकी ये अपेक्षा कि इसकी जांच एसआईटी के द्वारा या सीबीआई के द्वारा कराई जाए, आप इसपर ध्यान देंगे और अपने ऊपर लगने वाला लांछन स्वतः समाप्त करेंगे. मैं इतना और बता दूं कि पुलिस की रिपोर्ट में ये माना गया है कि श्री पुल की मृत्यु के कारण, उनके द्वारा लिखे 60 पृष्ठ के नोट में हैं. पुलिस ने जांच नहीं की, किसी संस्था ने जांच नहीं की, अरुणाचल सरकार की जांच की विनती को गृह मंत्रालय ने दबा दिया, तब प्रधानमंत्री जी, हम कैसे मानें कि आपमें भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस है. या फिर राजनैतिक सुविधा के लिहाज से, कुछ लोगों को धमकाने के लिए, चाहे वो सुप्रीम कोर्ट के जज हों, या कांग्रेस पार्टी हो, आपने इस जांच को फिलहाल निलंबित कर रखा है. जब इन दोनों, एक राजनीतिक पार्टी या सुप्रीम कोर्ट के जजों को दबाना होगा, तब आप इस जांच की कार्रवाई शुरू करेंगे. ईश्वर करे, ये सच न हो. क्योंकि प्रधानमंत्री को किसी भी प्रकार के अतिरिक्त दबाव पैदा करने की कम से कम भारत में आवश्यकता नहीं है. भ्रष्टाचार की परत-दर-परत खोलने वाला स्वर्गीय पुल का ये पत्र पूरा का पूरा हम इस अंक में छाप रहे हैं. सरकार से, राज्यसभा से और उपराष्ट्रपति जी से हम ये अपेक्षा करते हैं कि इस पत्र की सच्चाई और इसमें लिखी हुई बातों को जांच कर, दूध का दूध और पानी का पानी करने की जिम्मेवारी उनके ऊपर है. इस देश में लोकतंत्र के प्रति और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति इज्जत बनी रहे. इसके लिए आवश्यक है कि उपराष्ट्रपति जी अपने कर्तव्य का पालन करें. वरना वे लोकतंत्र को खत्म करने के षड्यंत्र के हिस्सेदार माने जाएंगे.
देश की जनता से हम पूछना चाहते हैं कि जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है, तो पुलिस उसकी जांच करती है और अगर उसे ऐसे व्यक्तियों के नाम मिलते हैं, जो आत्महत्या के लिए उकसाने का काम करते हैं, तो पुलिस उन्हें गिरफ्तार करती है और अदालत उन्हें सजा देती है. इस केस में ऐसा क्यों नहीं किया गया, कारण तलाशें. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का नाम और उनके बाद मुख्य न्यायाधीश बनने वाले व्यक्ति का नाम श्री पुल ने अपने पत्र में लिखा है. उनके ऊपर लगा आरोप यदि सही नहीं है, गलत है, तो इसकी जांच कौन कराएगा? पुलिस ने जांच नहीं की, प्रधानमंत्री ने अनदेखा कर दिया, उपराष्ट्रपति ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया, राष्ट्रपति स्वयं इसमें शामिल बताए गए हैं. आखिर किसी ने खंडन क्यों नहीं किया? मरा हुआ व्यक्ति साधारण व्यक्ति नहीं है, आम आदमी नहीं है. वो व्यक्ति जिसने आत्महत्या की, जिसने ये आरोप लगाए और मरने से पहले लगाए, उसके मृत्यु पूर्व दस्तावेज को क्यों अनदेखा कर दिया गया? ये माना जाता है कि 90 प्रतिशत वो बातें सही होती हैं, जो मरने वाला मरने से पहले लिखता है. ये सवाल, सवाल, सवाल, सवाल, सवाल… एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा हैं. इसका जवाब आज नहीं तो कल, इस व्यवस्था को, सुप्रीम कोर्ट के जजों को, प्रधानमंत्री को और उपराष्ट्रपति को देना ही होगा.
एक सुसाइड नोट की हत्या की यात्रा
- 17 फरवरी 2017 को कलिखो पुल की पत्नी दंगविम साई ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जे एस खेहर को पत्र लिख कर मांग की कि कलिखो पुल के सुसाइड नोट में जिन न्यायाधीशों के नाम रिश्वत के आरोपों में दर्ज हैं, उनके विरुद्ध जांच कराई जाए.
- कलिखो पुल ने अपने सुसाइड नोट में आरोप लगाया था कि जुलाई, 2016 में उनकी सरकार को अपदस्त करने का आदेश देने वाली संविधान पीठ के जजों ने अनैतिक/अवांछित प्रभाव में आकर ये आदेश पारित किए है.
- सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने दंगविम साई के पत्र पर सुनवाई की और इसे क्रिमिनल रिट पिटीशन के रूप में दर्ज़ करने के आदेश दिए.
- सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने रिट पिटीशन दर्ज़ करते हुए इसे जस्टिस ए. के गोयल और जस्टिस यू.यू. ललित की बेंच में सुनवाई हेतु भेजा.
- कोर्ट के रजिस्ट्रार ने सुनवाई होने के 1 दिन पूर्व श्रीमती पुल (दंगविम साई) को उनके मोबाइल नंबर पर रिट पिटीशन दर्ज़ होने की आधिकारिक सूचना दी.
- मामले की सुनवाई के दौरान श्रीमती कलिखो पुल के वकील दुष्यंत दवे ने इस मामले की न्यायिक सुनवाई के बारे में कई सवाल खड़े किए.
- श्री दवे ने कोर्ट में खुलासा किया कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने हाल ही में उनसे मुलाक़ात की और कई सनसनीखेज जानकारियां दी. लेकिन उन सब का खुलासा कोर्ट में किया जाना उचित नहीं है.
- उन्होंने कहा कि याची ने सुसाइड नोट में न्यायाधीशों पर लगाए गए करप्शन के आरोपों की प्रशासनिक जांच की याचना की है न कि इसके न्यायिक परीक्षण की.
- उन्होंने श्रीमती पुल के पत्र को रिट पिटीशन में तब्दील करने को लेकर भी सवाल खड़े किए.
- श्री दवे ने ये भी टिप्पणी की कि इस रिट पिटीशन को जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित की बेंच में भेजा जाना भी संदेह पैदा करता है. उन्होंने बताया कि जस्टिस गोयल काफी जूनियर जज हैं तथा वे सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहर के साथ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में बतौर जज काम कर चुके हैं.
- दवे ने कहा कि कलिखो पुल के सुसाइड नोट में जस्टिस खेहर पर भी करप्शन के आरोप हैं और ये भी कहा गया है कि उन्होंने 36 करोड़ की हुई डील में अपने बेटे का इस्तेमाल किया.
- श्री दवे ने के. वीरास्वामी वर्सेज यूनियन ऑ़फ इंडिया केस का हवाला दिया तथा इसी आधार पर सुसाइड नोट में न्यायाधीशों पर लगे करप्शन के आरोपों की प्रशासनिक जांच करने की मांग की.
- के. वीरास्वामी मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तथा सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. रामास्वामी के ससुर थे. वीरास्वामी पर आय के ज्ञात स्त्रोतों से अधिक सम्पति अर्जित करने के आरोप लगाए गए थे. इन आरोपों के खिलाफ उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया.
- वे हाई कोर्ट के पहले चीफ जस्टिस थे, जिनके विरूद्ध महाभियोग चलने का आदेश दिया गया.
- वीरास्वामी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और अंततः वीरास्वामी को पदच्युत कर दिया गया.
- श्री दवे ने ये भी कहा कि इस मामले को सुनवाई हेतु कोर्ट नंबर 13 में भेजा जाना तथा इसकी सुनवाई का समय भोजनावकाश के दौरान 30 पीएम पर तय किया जाना भी संदेह पैदा करने वाला है, क्योंकि सुनवाई का ये अस्वाभाविक समय था.
- सुनवाई के दौरान जस्टिस यू. यू. ललित और ए. के. गोयल की बेंच ने कहा कि अगर श्री दवे या उनकी याचिकाकर्ता अभी पिटीशन को वापिस लेना चाहें, तो ले सकते हैं. लेकिन दुष्यंत दवे ने प्रशासनिक जांच को लेकर ज़ोर देना जारी रखा. बेंच द्वारा दवे की दलीलों पर जब विचार करने से इंकार कर दिया गया, तब ये मान कर कि पिटीशन खारिज हो जाने पर उनके लिए पैरवी के सभी रास्ते बंद हो जाएंगे, श्रीमती पुल की सहमति से श्री दवे ने याचिका वापस ले ली. श्रीमती पुल ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए हमने प्रशांत भूषण से सम्पर्क साधा था, लेकिन वे किसी अन्य केस में व्यस्त थे. इस बीच प्रशांत भूषण ने दुष्यंत दवे से कुछ बातचीत की और श्री दवे ने मेरिट के आधार पर ही इस मामले में पैरवी की. हमने ये याचिका भी प्रशांत भूषण की सलाह पर वापिस ली थी.
- मामले की सुनवाई करने के उपरांत बेंच ने रिट पिटीशन को ये कह कर खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापिस ले ली है.
- बेंच ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस या अन्य जजों के विरुद्ध यदि गंभीर आरोप हैं, तो सरकार राष्ट्रपति से अनुमति लेकर वरिष्ठ जजों की बेंच बनाकर जांच करा सकती है.
- लेकिन बाद में इसपर राष्ट्रपति, केंद्र सरकार, विपक्ष और मीडिया सभी ने चुप्पी साध ली और एक मुख्यमंत्री की ख़ुदकुशी रहस्य बनकर रह गई.
उपराष्ट्रपति को पत्र
- 28 फरवरी 2017 को श्रीमती दंगविम साई ने उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को पत्र लिख कर मांग की कि एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम) गठित कर श्री पुल के सुसाइड नोट में दर्ज़ जजों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए.
- श्रीमती पुल ने कहा कि श्री पुल के सुसाइड नोट को मृत्यु पूर्व बयान के रूप में देखा जाना चाहिए. चूंकि सुसाइड नोट में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं, इसमें सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान चीफ जस्टिस और एक दूसरे वरिष्ठ जज के नाम हैं, इसलिए इसकी जांच एक ऐसी एजेंसी से कराया जाना आवश्यक है, जो सरकार के नियंत्रण से बाहर हो, जिससे न्यायपालिका के सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा हो सके. उन्होंने मिसाल के तौर पर वीरास्वामी बनाम भारत सरकार केस का उद्धरण भी पेश किया.
- उन्होंने ये भी तर्क दिया कि सामान्यतः सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत होने पर राष्ट्रपति के माध्यम से जांच कराने का प्रावधान है. लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक वरिष्ठ जज तथा राष्ट्रपति महोदय का भी नाम है, इसलिए मैं उपराष्ट्रपति महोदय को पत्र लिख कर जांच कराने की मांग कर रही हूं.
- श्रीमती पुल ने उपराष्ट्रपति से ये आग्रह भी किया कि वे इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करने हेतु जस्टिस खेहर व जस्टिस दीपक मिश्रा के अतरिक्त किन्ही अन्य 3 या 5 वरिष्ठ जजों की एक बेंच बनाने हेतु निर्देशित करें, जिससे मामले की सही ढंग से जांच हो सके. अन्यथा उन राजनेताओं और जजों की निष्ठा और ईमानदारी पर संदेह के बादल छाए ही रहेंगे, जिनके नाम श्री पुल ने अपने सुसाइड नोट में लिखे हैं. श्रीमती पुल के इस पत्र पर भी उपराष्ट्रपति ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की.
गृह मंत्री को पत्र
- श्रीमती पुल 03.2017 को देश के गृह मंत्री श्री राजनाथ सिंह से दिल्ली में मिलीं और उन्हें पत्र लिख कर एसआईटी के माध्यम से सारे मामले की जांच कराने की मांग की. उन्होंने आग्रह किया कि ये जांच सुप्रीम कोर्ट की देख रेख में होना ज़रूरी है, क्योंकि दोनों जजों के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे होने के कारण इसमें न्यायपालिका की गरिमा भी दाव पर लगी है. उन्होंने अपने और अपने परिवार के लिए केंद्रीय सुरक्षा एजेंसी से सुरक्षा उपलब्ध कराए जाने की भी मांग की.
- श्रीमती दंगविम साई के साथ गृह मंत्री से मिलने वालों में उनका बेटा ओज़िंग-सो पुल तथा कालिखो पुल के सचिव रहे आर.एन. लोलूम शामिल थे. गृह मंत्री ने श्रीमती पुल को ये कह कर टरका दिया कि वे अभी 4-5 दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं, लौट कर आने के बाद मामले का अध्ययन करेंगे. बावजूद इसके, गृह मंत्री ने आज तक इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं की.
- श्रीमती पुल ने बताया कि मार्च 2017 में ही अरुणाचल सरकार ने ये मामला गृह मंत्रालय को इस अनुशंसा के साथ भेज दिया था कि वे जांच के बारे में उचित फैसला लें, लेकिन गृह मंत्रालय ने इसे दबा दिया.
जुएल ओरांव को पत्र
- श्रीमती पुल ने इसी तरह जनजाति मामलों के मंत्री जुएल ओरांव को 03.2017 को पत्र लिख कर न्याय दिलाने की मांग की. पत्र में उन्होंने ये भी कहा कि वे एक जनजातीय महिला हैं और सम्बंधित विभाग के मंत्री होने के नाते उनका ये दायित्व भी बनता है कि वे श्री कलिखो पुल की मृत्यु के कारणों तथा उनके सुसाइड नोट में लगाए गए आरोपों की जांच कराने में मदद करें. श्री ओरांव ने भी इस पर कार्यवाही नहीं की.
- 03.2017 को ही श्रीमती पुल ने राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष को भी पत्र लिख कर इस मामले में हस्तक्षेप और सहायता करने की मांग की, लेकिन महिला आयोग ने भी चुप्पी साध ली.
- 04.2017 को श्रीमती पुल ने सुप्रीम कोर्ट के तीनो वरिष्ठ जजों जस्टिस जे.चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस मदन बी लोकुर को पत्र लिख कर सुसाइड नोट में लगाए गए आरोपों के बारे में एफआईआर दर्ज़ कराने और जांच कराने की मांग की. उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि श्री पुल के सुसाइड नोट में चीफ जस्टिस खेहर, वरिष्ठ जज दीपक मिश्रा और राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी का भी नाम है और इस कारण आप तीनो वरिष्ठ जज हीं इस बारे में निर्णय लेने में सक्षम हैं, इसलिए वे ये अपील कर रही हैं.
- पत्र के साथ उन्होंने सुसाइड नोट तथा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखे गए पत्र की प्रतिलिपि भी संलग्न की. इन तीनो जजों ने भी आजतक कोई जवाब नहीं दिया.
- श्रीमती पुल इसी दौरान केंद्रीय गृह सचिव राजीव महर्षि से भी मिलीं और सारे प्रकरण की निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने की मांग की. श्री महर्षि ने कहा कि वे इस मामले में कानूनी राय ले रहे हैं, लेकिन कोई कार्यवाही अभी तक नहीं हुई.
- श्रीमती पुल ने अपनी फरियाद लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की कई बार कोशिश की, लेकिन अ़फसोस की बात ये है कि पीएमओ द्वारा उन्हें आजतक मुलाक़ात का समय ही नहीं दिया गया. दिलचस्प ये है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ऐसा उपेक्षापूर्ण व्यवहार उस मुख्यमंत्री के परिजनों के साथ कर रहा है, जिसने भाजपा के सहयोग से ही अरुणाचल में सरकार बनाई थी.
- श्री कालिखो पुल की रहस्यमय मृत्यु और उनके द्वारा सुसाइड नोट में कई शीर्ष नेताओ और जजों के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराए जाने की मांग को लेकर अरुणाचल प्रदेश में अभी भी पुल समर्थक धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र की भाजपा सरकार इसका संज्ञान ले रही है. ये तब है, जब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू संसद में उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते है.
मुख्यमंत्री (पू.) ने आत्महत्या से पहले आखिरी बार लिखा
• अरुणाचल के मुख्यमंत्री कलिखो पुल ने आत्महत्या के पहले खोल दी थी नेताओं और जजों की पोल
• सुप्रीम कोर्ट, राजनीतिक दलों और मीडिया ने दबा दिया कालिखो पुल का सनसनीखेज सुसाइड नोट
• सुसाइड नोट जैसा ठोस आखिरी सबूत पेश किए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने नहीं की सुनवाई
• पहली बार ‘चौथी दुनिया’ हूबहू छाप रहा मुख्यमंत्री कलिखो पुल का 60 पेज का सुसाइड नोट
मैंने एक बहुत ही गरीब और पिछड़े हुए घर में जन्म लिया. मैंने उम्र भर दुःख देखे हैं. दुःख सहा है और बहुत बार दुख पर विजय भी पाई है. लेकिन विधाता ने मेरे जन्म से ही हर एक कदम पर मेरी कठोर परीक्षा ली है. आम लोगों को मां-बाप से दुलार मिलता है, प्यार मिलता है, शिक्षा मिलती है, समझ मिलती है. वहीं मेरे जन्म के 13 महीने बाद ही मां का साया छीन गया और जब मैं छह साल का हुआ, तो पिता भी भगवान को प्यारे हो गए. मेरे अपने कोई नहीं हैं. मां पिता और परिवार के प्यार से मैं हमेशा वंचित रहा हूं.
खुद अपने पैरों पर खड़ा हुआ हूं
मैं समझता हूं कि इस दुनिया में मैं अकेले ही आया हूं और अकेले ही जाऊंगा. मैं मानता हूं कि इस दुनिया में हर इंसान मां के पेट से नंगा ही आता है और नंगा ही जाता है (कोई भी यहां से कुछ भी लेकर नहीं जाता है). मतलब जन्म से हर कोई खाली हाथ ही आता है और एक दिन खाली हाथ ही चला जाता है. अगर हर इंसान इस बात को समझ ले तो कभी भी, कहीं भी, धर्म, जाति, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के नाम पर झगड़े नहीं होंगे और न ही धन-दौलत, जमीन, जायदाद, सत्ता, शक्ति और प्रतिष्ठा की लड़ाई होगी.
मैं जानता हूं कि जब इंसान जन्म लेता है तो वह नाम, जाति, धर्म, समाज, भाषा, क्षेत्र, धन-दौलत, जमीन-जायदाद कुछ भी अपने साथ नहीं लेकर आता है. लेकिन आज इंसान इन बातों को भूलता चला जा रहा है. वो इन चीजों के लिए मरने-मारने तक को तैयार हो जा रहा है. जबकि इस अटल सच को भूल जाता है कि मैं सिर्फ एक आत्मा हूं. मैंने जिंदगी को हमेशा से सच दिखाने वाले आईने की तरह देखा है.
मैं ये मानता हूं कि इस दुनिया में मेरा कुछ भी नहीं है. अपने शरीर के अलावा, हम जो भी चाहते हैं, घर में जो भी सामान है, रुपया-पैसा, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़ा, जमीन-जायदाद, शक्ति-सत्ता और प्रतिष्ठा, जिनके ऊपर मैं-मैं-मैं और मेरा-मेरा-मेरा कह कर उसके लिए हम लड़ते हैं और हम मालिक बनते हैं, वह असल में मेरा है ही नहीं.
जो आज मेरा है, वह कल किसी और का था. परसों किसी और का हो जाएगा. परिवर्तन ही संसार का नियम है. लेकिन परिवर्तन को नियम के तहत और सही ढंग से होना चाहिए.
मैंने बचपन से ही जिंदगी से लड़ना सीख लिया था. फिर चाहे वह लड़ाई रोटी की हो या अपने हक की. बचपन में एक वक्त की रोटी के लिए मैं मीलों दूर रास्ता तय कर जंगल से लकड़ियां लाता था. गरीबी और लाचारी की मार झेलते हुए मैंने दिन में डेढ़ रुपए मजदूरी पर बढ़ई (लरीशिपींशी) का काम किया है, जिससे मैं 45 रुपए महीने कमाता था. आज भी बढ़ईगीरी का सामान मेरे पास रखा है.
मैं बचपन में नियमित स्कूल नहीं जा पाया. लेकिन अपने बढ़ईगीरी के काम के साथ-साथ मैंने वयस्क शिक्षा केंद्र (Aअर्वीश्रीं एर्वीलरींळेप उशपींीश, थरश्रश्रर) से पढ़ाई की. मेरी मेहनत और लगन देखकर स्कूल प्रशासन ने मेरी परीक्षा ली और मुझे सीधे कक्षा छह में दाखिला दे दिया गया. फिर मैंने जब दिन के स्कूल में दाखिला लिया, तब 6 से 8 कक्षा तक कैजुअल नौकरी भी की. दिन में पढ़ता और रात में चौकीदारी करता था, जिसमें सुबह पांच बजे राष्ट्रीय झंडा फहराता था और शाम को पांच बजे झंडा उतार लेता था. इसमें मुझे 212 रुपए महीने की आमदनी होती थी.
अपने जीवन में मैने सबसे पहले 400 रुपए में एक ओबीटी घर बनाने का ठेका लिया था. जिसके बाद अपने जिले और राज्य में बहुत सी सड़कें, सरकारी मकानों और पुलों का निर्माण किया. 11-12 कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते मेरे पास खुद की जिप्सी गाड़ी और चार ट्रक गाड़ी थी. जिसे मैं व्यापार के काम में लगाता था.
कॉलेज पहुंचने तक मेरा व्यापार काफी आगे बढ़ गया, मेरे पास गाड़ी-घोड़ा, नौकर-चाकर और खुद का एक छोटा सा पक्का मकान भी था, जिसमें 3 कमरे थे. आज 23 साल तक मंत्री पद पर रहते हुए भी मैंने उससे आगे एक भी कमरा नहीं बढ़ाया है. खूपा में एक छोटा सा घर है, जिसे मैंने 1990 में तीनसुकिया एसबीआई बैंक से पर्सनल लोन लेकर बनाया था. हेउलियांग में एक घर हैं, जिसे मैंने भारतीय स्टेट बैंक तेजू से लोन लेकर बनाया था.
विधायक बनने से पहले मेरे पास आरा मशीन और काष्ठकला की फैक्ट्री भी थी, जिससे मुझे हर साल 46 लाख रुपए की आमदनी होती थी. मैं अपने छात्र जीवन में ही करोड़पति बन गया था. इसपर मैंने कभी घमंड नहीं किया. भगवान गवाह है कि मैंने कभी धन-दौलत, घर-बंगला, गाड़ी-घोड़ा, नौकर-चाकर, सत्ता और प्रतिष्ठा को अपनी जागीर नहीं समझा और न ही इन चीजों पर कभी गर्व व घमंड किया है. मैंने हमेशा से ही इंसानियत की सुरक्षा और गरीबों की सेवा को अपना कर्म समझा है और अब तक उन्हीं के हित के लिए काम कर रहा हूं.
मैं बड़े फक्र से कह सकता हूं कि मैं खुद अपने पैरों पर खड़ा हुआ हूं. लेकिन मैंने कभी इस बात पर गुमान नहीं किया. मैंने अपने रुपयों से हमेशा गरीब, लाचार, अनाथ और जरूरतमंद लोगों की सहायता की है. आज भी मैं 96 गरीब लड़के-लड़कियों को पढ़ाने के साथ उनका सालाना खर्च भी उठाता हूं.
26 दिसम्बर 1994 को जब मैं राजनीति से जुड़ा, उसके अगले ही दिन मैंने अपने दो बिजनेस ट्रेडिंग लाइसेंस को डीसी कार्यालय में वापस कर समर्पण कर दिया. क्योंकि जब मैं राजनीति में आ गया, तो इसे व्यापार के साथ मिलाना नहीं चाहता था. मैं कभी भी राजनीति में नहीं आना चाहता था, लेकिन मुझे जनता ने जबरदस्ती राजनीति में उतारा है. लोग राजनीति में अपने स्वार्थ के लिए आते हैं, लेकिन अगर कोई इसे ईमानदारी से अपनाए तो इससे अच्छा, सेवा और भलाई का काम कोई हो ही नहीं सकता. क्योंकि एक नेता के कह देने से, एक फोन कर देने से, एक सिफारिश कर देने से या किसी सभा में प्रस्ताव रख देने से समाज और जनता का काम हो जाता है, तो इससे बड़ा और अच्छा भलाई या खुशी का काम क्या हो सकता है.
वर्ष 2007 में भी मुझे मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला था, लेकिन उस वक्त मैंने मना कर दिया था. वर्ष 2011 में भी मुझे फिर से मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी दी गई, जिसे मैंने फिर से ठुकरा दिया. मैं जानता था कि मेरे साथी विधायक और मंत्री मुझे सिस्टम से, नीति से, कानून से और संविधान के तहत चलने नहीं देंगे.
लोगों की सेवा के लिए सीएम बना
जब तीसरी बार मुझे मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला, तो मैंने उसे स्वीकार किया. मेरी इच्छा, मेरा सपना और मेरी कोशिश थी कि मेरा पिछड़ा राज्य और गरीब जनता हर क्षेत्र में आगे बढ़ें. सड़क-यातायात ठीक हो, लोगों को शुद्ध-स्वच्छ और नियमित पानी मिले और अच्छी व उच्च शिक्षा मिले. मैं चाहता था कि लोगों को बेहतर और मुफ्त स्वास्थ्य सेवा मिले और बिना रुके 24 घंटे हर घर-हर परिवार को बिजली मिले, हर जाति और समाज को शांत और सुरक्षित माहौल मिले, लोगों के रहन सहन का स्तर व उनकी आमदनी बढ़े, सभी लोग उन्नत और विकासशील हों, राज्य के हर घर में खुशहाली हो और आम जन हर प्रकार से आगे बढ़े. इन बातों को ध्यान में रखते हुए और उन कामों को मुकाम देने के लिए मैंने अपने तन-मन, दिमागी-चिंतन, सोच-विचार, कठिन मेहनत और लगन से राज्य को ऊंचाई देने व जनता की भलाई, उन्नति और बेहतर कल के लिए हर घड़ी हर पल काम किया. लेकिन शायद मेरे साथी मंत्रियों और विधायकों को यह बात मंजूर नहीं थी. क्योंकि उनके लिए मंत्री व विधायक बनने का मतलब कुछ और ही होता होगा. यही कारण है कि मैं राजनीति से दूर रहना चाहता था.
मैंने अपने 23 सालों की राजनीति में अलग-अलग मंत्री पदों पर रहते हुए राज्य के विकास में हर संभव योगदान दिया है. अपने विधानसभा क्षेत्र और पूरे राज्य में काम किया है. लेकिन इन कामों पर हर किसी की नजर नहीं गई. अपने 23 साल के राजनीतिक जीवन में मैंने बहुत से मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया, लेकिन अपने अनुभव से मैंने देखा व समझा कि किसी भी मुख्यमंत्री व मंत्री की योजना स्पष्ट नहीं थी, वे किसी भी योजनाओं को सही से प्राथमिकता नहीं दे पाए. उन्होंने हमेशा राजनीति की नजरों से ही फैसला लिया, हमेशा जनता के हितों को नजरअंदाज किया. विधायक व मंत्री हमेशा आपस में हिसाब-किताब कर एक दूसरे को लाभ देने व खुश करने में ही लगे रहे.
जबकि मेरी परिभाषा ये है कि नेता बनने का मतलब केवल अपने घर-परिवार, सगे-संबंधी और दोस्तों को फायदा पहुंचाना नहीं होता. मंत्री, विधायक व बड़े अधिकारी एक-दूसरे की मदद के लिए नहीं आए हैं, बल्कि राज्य के पूर्ण विकास व गरीब जनता की सेवा के लिए उन्हें चुना जाता है. अपने 23 साल के राजनीतिक जीवन में मैंने नेताओं को इसके बिल्कुल उल्टा ही काम करते देखा है. वे लोग सिर्फ एक-दूसरे को या बड़े नेता, बड़े अधिकारी और बड़े व्यापारियों को ही मदद व फायदा पहुंचाने का काम करते रहे हैं.
साढ़े चार महीने के अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में मैंने अपना सुख-चैन, घर-परिवार, नींद-आराम को त्यागकर 24 घंटे जनता के हित में काम किया. मैंने सही अर्थों में राजधर्म का पालन किया है. इतना ही नहीं मैंने राज्य में विभिन्न विभागों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस और कानून में 11,000 से ज्यादा पदों की जगह निकाली थी, जिन्हें बिल्कुल पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से लागू किया जाना था. मैंने प्लान, नॉन-प्लान फंड को सही और योजनाबद्ध तरीके से पेश किया था. मैंने राज्य में ट्रांसफर-पोस्टिंग, प्रमोशन और अपॉएंटमेंट के लिए मंत्रियों को पैसे लेने से मना किया था, जिसका शायद उन्हें बुरा लगा. प्लान फंड, नॉन-प्लान फंड, कॉन्ट्रैक्ट वर्क, टेंडर वर्क और बिल पेमेंट में कमीशन लेने के लिए भी मनाही थी. शायद यह बात भी उन्हें बुरी लगी.
मैं केवल इतना जानता हूं कि 14-15 लाख की जनसंख्या वाले राज्य में 60 एमएलए को चुना जाता है. उनमें से 12 मंत्री बनते हैं. मैं सोचता हूं कि वे 60 एमएलए उच्च शिक्षा, सामाजिकता, बेहतर नेतृत्व और उदार सोच के साथ-साथ सभी तरह से अच्छे इंसान हों. वे जनता की सेवा और सुरक्षा को अपना धर्म मानते हों, इंसानियत को अपना ईमान और जनता की भलाई को अपना कर्म समझते हों. हमारे नेताओं को परिवार, समुदाय, जाति, धर्म और समाज से ऊपर उठकर काम करना चाहिए. लेकिन ऐसे नेताओं की आज जैसे कमी ही आ गई है. आज राज्य में हर एक मुख्यमंत्री (पू.) ने आत्महत्या से पहले आखिरी बार लिखा मुझसे 86 करोड़ मांगे गए नेता अपनी जेब भर रहा है. अपने स्वार्थ पूरे कर रहा है. जनहित से ज्यादा वह अपने लिए, अपने परिवार और रिश्तेदारों के बारे में ज्यादा सोच रहा है. मैंने ये महसूस ही नहीं किया, बल्कि अपनी आंखों से देखा भी है. इस बात से मैं बहुत ही आहत और दुखी हूं. इस राज्य के पिछड़ने का कारण भी यही है. राज्य में मंत्री-विधायक आपसी सहयोग से केवल खुद को ही आगे बढ़ाते हैं और गरीब जनता को नजरअंदाज करते हैं. वहीं, मुख्यमंत्री बड़े नेताओं, बड़े अधिकारियों, बड़े व्यापारी को खुश करने में लगा रहता है. ऐसी स्थिति में राज्य, समाज और जनता का क्या होगा?
नेताओं ने राजनीति को धंधा बना लिया है
राज्य में सड़क, पानी, बिजली, कानून, शिक्षा, स्वास्थ्य और सफाई व्यवस्थाओं को सुचारू करने पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. जिससे आम जनता नेताओं को शक की नजरों से देखती है. यहां हर एक विधायक को मंत्री बनना है, वह भी वर्क्स डिपार्टमेंट में, जहां उन्हें ज्यादा और मोटी कमाई हो. सभी को ज्यादा से ज्यादा नगद पैसा चाहिए. नेताओं और विधायकों ने इसे अपना धंधा बना लिया है. यही सब कारण है कि राज्य में सरकार बार-बार बदलती है. जिसका नुकसान आम जनता और राज्य को उठाना पड़ता है. सरकार बदलने से बहुत सी योजनाएं और प्रोग्राम बदलते हैं, जिससे विकास की राह और गति रुक जाती है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. इस बात से मैं बहुत ही आहत और दुखी हूं. मैं लोगों में जागरूकता लाना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि वे विचार-विमर्श करें, इन बातों को समझें और अपनी सोच-समझ, कर्म-कार्य, हाव-भाव और नीतियों को बदलें. ताकि हम अपने राज्य और देश के सुनहरे भविष्य के सपने को साकार कर सकें.
आज जनता को मंत्रियों और विधायकों से पूछना चाहिए कि पांच साल में उनके पास धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद, बंगला-गाड़ी कहां से आ गए? जनता को भ्रष्टाचार पहचानना चाहिए और सवाल करना चाहिए कि विधायक या मंत्री बनने से पैसा बनाने का क्या सर्टिफिकेट मिल जाता है? या पैसा छापने की फैक्ट्री और मशीन मिल जाती है? मैं मानता हूं कि जनता जनार्दन है और उन्हें सच को पहचानना चाहिए.
दोरजी खांडू सेना के आम सिपाही थे, विधायक बनने के बाद भी उनके पास कुछ नहीं था. लेकिन जब वे रिलीफ मंत्री बने, तब उन्होंने सरकारी ठेकों को 50 प्रतिशत में बेचकर अपनी जेब में भरना शुरू कर दिया. जब वे पावर (ऊर्जा) मंत्री बने, तब उन्होंने पूरे अरुणाचल प्रदेश में हाइड्रो प्रोजेक्ट योजना में नदी नालों को बेचकर पैसे गबन किए. उन्होंने 30 लाख प्रति मेगावाट के हिसाब से कंपनी को प्रोजेक्ट बेचकर मोटी कमाई की थी.
उसके बाद उन्होंने अपांग की सरकार को गिरा दिया और खुद मुख्यमंत्री बन गए. आज उनके (दोरजी खांडू) तवांग, ईटानगर, गुवाहाटी, दिल्ली, कोलकाता और बेंगलुरु में बड़े-बड़े आलीशान मकान और बंगले हैं. बहुत से फार्म हाऊस, होटलें और कॉमर्शियल इस्टेट हैं. आज लोग कहते हैं कि दोरजी खांडू ने घोटाले कर 1700 करोड़ रुपए से ज्यादा धन कमाया, सम्पत्ति बनाई. लेकिन आज वे तो इस दुनिया में नहीं हैं, फिर ये धन-दौलत क्या काम आया? इससे जिन्दगी तो नहीं खरीद सकते और न ही इस धन-दौलत को दूसरी दुनिया में ले जा सकते हैं. कहने का मतलब है, हर किसी को मेहनत-मजदूरी कर अपनी किस्मत में जो है और अपनी जरूरत तक ही कमाई करनी चाहिए. सोशल मीडिया, फेसबुक और वॉटसअप पर लोग कह रहे और पूछ भी रहे हैं कि पेमा खांडू के पास आज जो 1700 करोड़ नगद पैसा है, वो पैसा कहां से आया?
जनता ये खुद सोचे और विचार करे कि मंत्री बनने से पहले उनके पास क्या था और आज क्या है? उनके पास कोई पैसा बनाने की मशीन या फैक्ट्री तो नहीं थी और न ही कुबेर का कोई खजाना था. फिर इतना पैसा कहां से आया? ये जनता का पैसा है. मंत्री बने ये लोग इसी पैसों का रोब दिखाकर जनता को डराते-धमकाते हैं और लोग उसके पीछे भागते हैं. आज जनता को इसका जवाब मांगना चाहिए और इस मामले को पूरी छानबीन होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस का पूरा खर्च नबाम तुकी और पेमा खांडू ने मिलकर उठाया था. जिसका फैसला मेरे खिलाफ दिया गया था. ये रकम करीब 90 करोड़ रुपए थी. इस केस में मेरे हित में फैसला देने के लिए मुझे भी फोन किया गया और मुझसे भी 86 करोड़ रुपए की मांग की थी. लेकिन मुझे और मेरे जमीर को ये मंजूर नहीं था. मैंने भ्रष्टाचार नहीं किया, मैं कमाया नहीं और न ही राज्य को कुएं में गिराने की मेरी इच्छा थी. मैं अपनी सत्ता को बचाने के लिए सरकार और जनता के पैसे का दुरुपयोग क्यों करूं? इसका नतीजा आप सबके सामने है.
राहत का पैसा नेताओं की जेब में
तवांग में आज से ही नहीं बल्कि वर्षों से विकास के नाम पर बहुत सा पैसा जा रहा है, लेकिन वहां पैसों का दुरुपयोग हुआ है और नेताओं ने अपनी जेबें भरी हैं. 2005 से रिलीफ फंड के नाम से वहां बहुत पैसा जा रहा है. जनता आरटीआई से इसकी जानकारी ले सकती है. प्रोजेक्ट का दौरा करने पर वहां जमीन पर कुछ भी नहीं मिलेगा. टूरिज्म के नाम पर बहुत पैसा जा रहा है. अर्बन डेवलपमेंट के नाम पर बहुत पैसा जा रहा है. पावर के क्षेत्र में बहुत पैसा जा रहा है. किटपी हाइड्रो प्रोजेक्ट के नाम से वर्ष 2010-11 में बिना सैंक्शन और बिना काम के 27 करोड़ रुपए ‘एलओसी’ (लाइन ऑफ क्रेडिट) किया गया, बिना बिल के पैसे उठाए गए. उन पैसों का गबन किया गया. इसी प्रकार खान्तांग और मुकतो हाइड्रो प्रोजेक्ट के नाम से भी झूठा बिल बनाकर 70 करोड़ से भी ज्यादा पैसों का गबन किया गया.
सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हुए भीषण घोटाले (पीडीएस स्कैम) की असली जड़ नबाम तुकी और दोरजी खांडू हैं, उन्होंने ही इस घोटाले की शुरुआत की थी. गेंगो अपांग जब मुख्यमंत्री थे, तब राज्य में पीडीएस का साल भर का काम 61 लाख रुपए में ही हो जाता था. गेंगो अपांग इसे सुधारना चाहते थे, पर सभी ने मिलकर उन्हें फंसाया था. जब नई सरकार बनी तब नबाम तुकी फूड एंड सिविल सप्लाई मिनिस्टर थे. तुकी ने ही राज्य में सिर पर अनाज ढो कर ले जाने की व्यवस्था (हेड लोड सिस्टम) की शुरुआत की थी. एक साल में ही पीडीएस का काम 68 करोड़ रुपए तक बढ़ गया था. वही, अगले ही साल इस काम की लागत 164 करोड़ रुपए तक बढ़ गई थी. इस पर केंद्र सरकार को राज्य सरकार पर शक हो गया था और उन्होंने एफसीआई को जांच और ऑडिट करने का आदेश दिया, जिसमें राज्य सरकार को दोषी पाया गया था. इसके बाद केन्द्र सरकार ने पेमेंट रोक दिया था. पीडीएस घोटाला खुलने पर गेंगो अपांग ने ‘हेड लोड’ का काम बंद करवा दिया, जिससे ये पेमेंट वहीं रुक गया था.
पीडीएस भारत सरकार की योजना थी, जिसका पैसा एफसीआई के जरिए भारत सरकार से ही आता है. राज्य सरकार के पैसों से इसका पेमेंट नहीं होता था. जब 2007 में दोरजी खांडू मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने सार्वजनिक वितरण के काम से सम्बद्ध अपने ही ठेकेदारों को अपनी ही सरकार के खिलाफ केस करने के लिए उकसाया और इस काम के लिए उनकी मदद भी की. इस केस में राज्य सरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट, सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी कई बार जान-बूझकर हारती गई. दोरजी खांडू के नेतृत्व में राज्य सरकार ने कोर्ट में जान-बूझकर सही रिकॉर्ड और जानकारी नहीं दी थी और बहुत सी फाइल और रिकॉर्ड को मिटा दिया गया. 50 प्रतिशत हिस्सा लेकर दोरजी खांडू ने ही प्राइवेट पार्टियों को राज्य सरकार के खिलाफ अदालती आदेश (कोर्ट डिक्री) लेने में मदद की थी और पहला पीडीएस पेमेंट उन्हीं के समय में हुआ था.
30 नवम्बर 2011 तक जब मैं राज्य का वित्त मंत्री था, तब अदालती आदेश होने पर भी, मैंने और कृषि मंत्री सेतांग सेना ने पेमेंट नहीं दिया था. केवल पीडीएस पेमेंट देने के के कारण ही नबाम तुकी ने मुझे वित्त मंत्री के पद से हटाया था. मेरे वित्त मंत्री के पद से हटते ही चोउना मीन वित्त मंत्री बने और चार दिनों के अंदर ही 4/12/2011 को नबाम तुकी और चोउना मीन ने पीडीएस कॉन्ट्रैक्टर से पैसों में 50 प्रतिशत की हिस्सेदारी लेकर ‘हेड लोड’ का भुगतान कर दिया.
अपने 23 साल के राजनीतिक जीवन में मैंने पीडीएस बिल की फोटो-कॉपी पर पेमेंट होते पहली बार देखा था. ऐसा किसी और राज्य में नहीं होता है. 600 करोड़ रुपए से भी ज्यादा पैसों का पीडीएस पेमेंट हुआ. इन पैसों को राज्य के डेवलपमेंट फंड से दिया गया था. जबकि ये भारत सरकार की स्कीम थी और भारत सरकार ने इसमें घोटाला देखकर एक भी पैसा राज्य सरकार को नहीं दिया था. पीडीएस घोटाले के मुख्य दोषी दोरजी खांडू, पेमा खांडू, नबाम तुकी और चोउना मीन ही हैं.
पूर्व मंत्रियों, पूर्व मुख्यमंत्री और अधिकारियों ने फाइल और तथ्यों को गायब कर दिया
जब मैं मुख्यमंत्री बना, तब मैंने इस केस की जांच की और राज्य सरकार को बचाने की कोशिश की थी. हमारी सरकार ने एफसीआई के खिलाफ केस किया, भारत सरकार के खिलाफ केस किया और सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका भी दाखिल की थी. मुझे इस बात का बहुत ही दुख है कि राज्य के पूर्व मंत्रियों, पूर्व मुख्यमंत्री और अधिकारियों ने मिलकर सभी फाइल, डॉक्युमेंट्स और जरूरी तथ्यों को गायब कर दिया और मिटा दिया. जिसकी वजह से मैं राज्य सरकार को मुख्यमंत्री (पू.) ने आत्महत्या से पहले आखिरी बार लिखा पीडीएस घोटाला इस केस में बचा नहीं सका. इस केस में मुख्य सचिव, सचिव, निदेशकों और अफसरों को जेल तक होने वाली है.
आज इस पीडीएस केस में वास्तविक ठेकेदारों को पैसा नहीं मिला, जबकि उन्होंने सही टेंडर भरा और सही काम भी किया, उचित मूल्य की दुकानों (फेयर प्राइस शॉप्स) तक चावल भी पहुंचाया था. वहीं, दूसरी ओर पीडीएस स्कैम में पेमा खांडू का नाम शामिल है, जिसका आज भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है. स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (एसजीएसवाई) के चावल घोटाले में भी दोरजी खांडू और पेमा खांडू खुद फंसे हुए हैं. आज इसका केस सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. अगर दोरजी खांडू जिंदा होते, तो अभी जेल में होते. पेमा खांडू आज मुख्यमंत्री हैं, फिर भी इस केस में बहुत जल्द जेल में जाएंगे. स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना ही गलत थी, क्योंकि इस योजना में एक भी दाना चावल गांवों तक नहीं पहुंचा और न लोगों को चावल मिला. ये सारा चावल असम में बेचा गया, वो एक घोटाला है. जो चावल गया ही नहीं, उसके लिए झूठा ट्रांसपोर्टेशन बिल बनाया गया, ये दूसरा घोटाला है. इन बाप-बेटों ने घोटालों पर घोटाले किए हैं. इस घोटाले पर कोई भी साधारण व्यक्ति या जनता पेमा खांडू से आज पूछे कि इस योजना में केंद्र से कितना चावल आया था? किसके लिए आया था? कब आया था? और किसको चावल मिला? और इस चावल घोटाले में कितने पैसों की कमाई हुई? मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इन सवालों के जवाब पेमा खांडू के पास नहीं हैं. उनका सिर्फ एक ही जवाब है, उनके पास आज ढेर सारा नगद पैसा है, जिनके पीछे जनता भागती है. लेकिन ये बात जनता को जानना और समझना चाहिए की ये इन सब घोटालों का पैसा है.
कमजोर, भ्रष्ट, बदमाश और लुटेरों को ही प्राथमिकता देना कांग्रेस पार्टी की नीति है. ऐसे ही लोगों को कांग्रेस नेता बनाती है, ताकि वो सरकार और जनता के पैसों को मिलकर लूटे और कांग्रेस आला कमान को पहुंचाता रहे, जिससे लगातार उनकी कमाई होती रहे. घोटालों और भ्रष्टाचार का पता होते हुए भी नेताओं और विधायकों ने आज तक कुछ नहीं किया. क्योंकि विधायकों और मंत्रियों को भी पीके थुंगन, गेगांग अपांग, दोरजी खांडू, नबाम तुकी और पेमा खांडू जैसे ही भ्रष्ट मुख्यमंत्री चाहिए. जिनके खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहे हैं. लेकिन यही लोग अधिकारियों, न्यायालयों और जजों को पैसा दे सकते हैं.
अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान मैंने हर जिले को सोशल एंड इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट फंड (एसआईडीएफ), ग्रामीण अभियंत्रण (रूरल इंजीनियरिंग) और ‘नॉन प्लान’ में बराबर फंड दिया था. इसके बाद भी पेमा खांडू और उनके दोनों भाईयों ने एक प्रोजेक्ट में मुझसे तत्काल 6 करोड़ रुपए हाईड्रो प्रोजेक्ट मैंन्टेनेंस के लिए मांगे थे, जिसे मैंने पूरा दिया. इन पैसों को अभी काम में ही नहीं लिया गया था कि उन्होंने फूड रिलीफ में मुझसे पैसे मांगे. उन्होंने 10 करोड़ की और मांग की थी. उस समय राज्य में फ्लड रिलीफ के लिए कुल 14 करोड़ रुपए ही थे, फिर भी मैंने सबसे ज्यादा 6 करोड़ रुपए तवांग में दिए थे.
अरुणाचल जैसे छोटे राज्य में हमारे पास एनडीआरएफ में केवल 51 करोड़ रुपए ही थे, जिसे 20 जिलों और 60 विधायकों को जरूरत होने पर देना था और उस समय में बहुत से जिले बाढ़ से पीड़ित थे. मुख्यमंत्री होने के नाते मुझे हर जिले और 60 विधायकों को बराबर देखना था. लेकिन पेमा खांडू और उनके दोनों भाईयों ने मुझसे 100.88 करोड़ रुपए की मांग की थी. मैंने उन्हें राज्य की स्थिति के बारे में बताया और समझाया. लेकिन इस बात से वे मुझसे नाराज हो गए और उन्होंने मेरे खिलाफ चाल चल दी थी.
तवांग गोलीबारी के पीछे भी पेमा खांडू
एक और बात मैं बताना चाहूंगा कि 2 मई को तवांग में हुई गोलीबारी की घटना के पीछे भी पेमा खांडू का ही हाथ है. गिरफ्तार हुए लामा आदमी को पेमा खांडू ने बेल नहीं देने दी थी. इस घटना के जिम्मेदार भी पेमा खांडू ही हैं. डीसी और एसपी तवांग की हुई फोन वार्ता में पेमा खांडू का जिक्र है. तवांग में हुई गोलीबारी की घटना में पेमा खांडू ने डीसी, एडीसी और मजिस्ट्रेट पर बेल न देने का दबाव बनाया था. मुझे और चीफ सेक्रेटरी को इस घटना के मामले में अधिकारियों पर कार्रवाई न करने का भी दबाव डाला था. उसके बावजूद हमने अधिकारियों पर कार्रवाई की, शायद इस बात का उन्हें बुरा लगा हो. इस घटना में कितने लोगों की जाने गईं, कितने लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे, उनका आज भी शिलांग और गुवाहाटी में इलाज चल रहा है. जबकि मैं खुद मृतकों के परिजनों से मिला, गंभीर रूप से घायल हुए लोगों से भी तवांग, शिलांग और गुवाहाटी में मिलकर हर संभव मदद की थी. जबकि पेमा खांडू को इस घटना पर कोई दुख और चिंता नहीं थी. लोगों को सोचकर फैसला करना चाहिए कि कौन सही और कौन गलत है?
विधायक से मंत्री और मुख्यमंत्री का फासला नबाम तुकी ने बहुत ही कम समय में तय कर लिया. विधायक बनने से पहले उनके पास कुछ भी नहीं था और आज आधे ईटानगर-नहारलागुन में उनकी जमीनें और सम्पति हैं. वहीं कोलकाता, दिल्ली और बेंगलुरु में भी उनके आलीशान बंगले, फार्म हाउस व जमीनें हैं. सोशल मीडिया, फेसबुक-व्हाट्सएप पर फोटो और वीडियो के साथ उनकी सम्पत्ति का ब्यौरा उपलब्ध है. इनका काला चिट्ठा कुछ इस तरह है:
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने नबाम तुकी के खिलाफ की गई सुनवाई में उन्हें दोषी ठहराते हुए सीबीआई जांच के आदेश दिए थे. लेकिन उसी केस में तुकी ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एच. एल. दत्तू को 28 करोड़ रुपए घूस देकर स्टे ले लिया और आज भी खुलेआम घूम रहे हैं.
अरुणाचल प्रदेश में हुए पीडीएस स्कैम पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अल्तमस कबीर ने कांट्रैक्टरों के हित में फैसला दिया था. जबकि केंद्र सरकार और एफसीआई ने भी इस फैसले को गलत ठहराया था.
फूड एंड सिविल सप्लाई के डायरेक्टर एन.एन. ओसीक के बैंक खाते से नबाम तुकी के खाते में 30 लाख रुपए ट्रांसफर किए गए थे. इस बात को गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी माना है. जिसका रिकॉर्ड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास भी है. इस केस में भी घूस देकर कोर्ट का फैसला खरीदा गया था.