बीते चार अप्रैल को इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज पर पूरे पन्ने की रिपोर्ट छपी, जिसमें देश को बताया गया कि 16 जनवरी को भारतीय सेना ने विद्रोह करने की तैयारी कर ली थी. इस रिपोर्ट से लगा कि भारतीय सेना देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को समाप्त कर फौजी तानाशाही लाना चाहती है. इस रिपोर्ट ने सारे देश में न केवल हलचल पैदा की, बल्कि सेना को लेकर शंका का वातावरण भी पैदा कर दिया. सभी चैनलों पर यह खबर चलने लगी, लेकिन तीन घंटे बीतते-बीतते सा़फ हो गया कि यह रिपोर्ट झूठी है, बकवास है, किसी खास नापाक इरादे से छापी गई है और इसे छपवाने के पीछे एक बड़ा गैंग है, जो हिंदुस्तान में लोकतंत्र को पसंद नहीं करता. यहां से सवाल खड़ा होता है कि कौन सा गैंग है, जो हिंदुस्तान में लोकतंत्र को पसंद नहीं करता और यह रिपोर्ट इसी समय क्यों छापी गई, 4 अप्रैल को. यह वैसा ही सवाल है, जैसे इन महान पत्रकारों और मीडिया के लोगों ने पूछा था कि जनरल वी के सिंह ने इसी समय अपना मशहूर इंटरव्यू आपके अ़खबार चौथी दुनिया को क्यों दिया? हम इस बात का भी जवाब देंगे कि यह इंटरव्यू इसी समय क्यों आया और यह ख़ुलासा इसी समय क्यों हुआ, लेकिन इस बात को भी जानेंगे और खोलेंगे कि 4 अप्रैल को ही क्यों इंडियन एक्सप्रेस ने ऐसी रिपोर्ट छापी, जो यह कहती है कि देश में सेना अपना राज क़ायम करना चाहती थी. हालांकि पूरी रिपोर्ट पढ़ने के बाद लगता है कि यह रिपोर्ट नहीं, अपने आप में साज़िश का एक पुलिंदा है. इसे पढ़ते ही लगता है कि कोई ग्रुप है, कुछ लोग हैं, जिन्होंने अपने रिश्ते इस अख़बार के संवाददाता या संपादक के साथ भुनाए हैं या फिर रिश्तों के अलावा जो चीज़ छापने के काम आती है और जिसका आरोप हमारे बहुत सारे साथियों पर लगता है, उसका खुला प्रयोग इस अख़बार के ऊपर किया गया है. अब आपको सुनाते हैं इस रिपोर्ट के पीछे की असली कहानी.
20 मार्च को मेरे पास एक रिपोर्ट आई कि भारतीय सेना देश में सैनिक क्रांति करना चाहती है. जो सज्जन मेरे पास यह ख़बर लेकर आए, उनसे मैंने पूछा कि इस ख़बर का स्रोत क्या है. जब उन्होंने मुझे स्रोत बताया तो मेरी समझ में आ गया कि यह देश के ख़िला़फ बहुत सोची-समझी साज़िश है और इस साज़िश में सेना की छवि जानबूझ कर बर्बाद करने की सोची-समझी योजना है. मैंने उसी समय अपने कुछ मित्रों से बात की. मुझे पता चला कि यह स्टोरी कई अख़बारों और कुछ टेलीविज़न चैनलों को संपर्क करके पहले ही दी जा चुकी है, लेकिन सबने मना कर दिया. उन्होंने कहा कि हम इस स्टोरी को नहीं छापेंगे, क्योंकि यह बेसलेस स्टोरी है. लोगों को इस तरह की स्टोरी छापने के लिए कई तरह के प्रलोभन भी दिए गए. सबने मना कर दिया कि न तो हम इस स्टोरी को टेलीविज़न पर दिखाएंगे, न छापेंगे, क्योंकि यह वाहियात स्टोरी है और यह देश की सेना की छवि ख़राब करने वाली खतरनाक स्टोरी है. मैंने अपने सेना के सोर्सेज से बात की. उन्होंने भी यही कहा कि यह बुलशिट है, लेकिन वहां से मुझे यह ख़बर पता चली कि इंडियन एक्सप्रेस इस ख़बर को छापने वाला है. मुझे लगा कि पत्रकार होने के साथ-साथ इस देश का नागरिक होने के नाते मेरा धर्म है कि मुझे इंडियन एक्सप्रेस को बताना चाहिए कि यह ख़बर अगर वह छापता है तो वह शायद देश हित के ख़िला़फ काम करेगा. मैंने इस विश्वास के आधार पर यह सोचा, क्योंकि मैं जानता हूं कि शेखर गुप्ता अब तक यानी इस रिपोर्ट के छपने तक, जो इंडियन एक्सप्रेस में छपी, एक जुझारू, ईमानदार और बहादुर पत्रकार माने जाते थे. मेरी शेखर गुप्ता से पहली मुलाक़ात रविवार में रहते हुए तत्कालीन संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह के साथ हुई थी और सुरेंद्र प्रताप सिंह ने ही मेरा परिचय शेखर गुप्ता से कराया था. शेखर गुप्ता को तबसे मैं वरिष्ठ, अपने से ज़्यादा समझदार, अपने से ज़्यादा जानकार और अपने से ज़्यादा बहादुर पत्रकार मानता था. मुझे लगा कि बिना हिचक शेखर गुप्ता से कहना चाहिए कि आपके अख़बार में इस रिपोर्ट को छपवाने की साज़िश हो रही है, आप इसके ऊपर थोड़ा ध्यान दीजिए. यह पत्रकारिता से बड़ी चीज़ है, किसी तरह की ग़ैर ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता से बड़ी चीज़ है. आप सारी दुनिया के सामने सेना को बदनाम कर दें, फिर मा़फी मांगने से काम नहीं चलता.
कांग्रेस की बड़ी नेता हैं किरन चौधरी. वह हरियाणा सरकार में मंत्री हैं और उनकी बेटी श्रुति चौधरी है, जो सांसद है. किरन चौधरी शेखर गुप्ता की बहुत अच्छी दोस्त हैं और तेजेंद्र सिंह की फर्स्ट कजिन यानी चचेरी बहन हैं. यह तेजेंद्र सिंह वही हैं, जिनका आदर्श सोसाइटी में फ्लैट हैं, जिनके खिला़फ जनरल वी के सिंह ने कार्रवाई की थी. यह वही तेजेंद्र सिंह हैं, जिन्होंने जनरल वी के सिंह के खिला़फ मानहानि का दावा किया है.
मैं शेखर गुप्ता के पास गया और मैंने उनसे बिना कोई भूमिका बांधे पूछा कि ऐसा सुनने में आया है कि एक स्टोरी बाज़ार में घूम रही है कि सेना सत्ता के ऊपर क़ब्ज़ा करना चाहती है और यह स्टोरी कुछ संदिग्ध तत्व, जो देश के ख़िला़फ क़दम उठा रहे हैं, आपके अख़बार में छपवाना चाहते हैं और उन्होंने इसके लिए आपके पत्रकार को तैयार कर लिया है. शेखर गुप्ता ने मुझे कहा कि नहीं, अभी एक जनरल यहां बैठे थे, वह भी यही बात कह रहे थे, उन्हें मैंने उस पत्रकार के पास भेज दिया है. मैंने शेखर से नहीं पूछा कि कौन जनरल थे, क्योंकि मुझे शक हुआ कि कहीं सेना का ही तो कोई आदमी सेना के ख़िला़फ ख़बर नहीं दे रहा है. लेकिन शेखर गुप्ता ने कहा कि जो आप कह रहे हैं, वह भी यही कहने आए थे कि जो ख़बर बाज़ार में चल रही है, वह ग़लत है, कोई छाप नहीं रहा है. हम छापने जा रहे थे, लेकिन अब हम इसमें सावधानी रखेंगे और इसे नहीं छापेंगे. जब शेखर गुप्ता ने यह आश्वासन दिया तो मुझे लगा कि वह अभी भी उसी पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे समाज विरोधी तत्व डरा करते हैं. दो दिन बाद शेखर गुप्ता और मैं, देश के एक वरिष्ठ व्यक्ति के साथ खाना खा रहे थे. खाना खाते हुए शेखर गुप्ता ने कई सवाल पूछे, जिनके जवाब अन-ऑफिशियली उस व्यक्ति ने बहुत सा़फ- सा़फ दिए और तभी शेखर गुप्ता ने पूछा कि क्या सेना का कोई मूवमेंट 16 जनवरी को हुआ था. उसने कहा, हां हुआ था. फिर उस व्यक्ति ने कहा, जिस तरह से बाज़ार में ख़बर बनी हुई है, उस तरह से नहीं हुआ था. उस व्यक्ति ने पूरी कहानी शेखर गुप्ता को बताई कि उसके पीछे क्या कारण थे. कारण यह था कि धुंध में अगर देश की राजधानी के ऊपर कोई हमला हो, किसी तरह का, तो हम राजधानी को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं और इसके पीछे डर आतंकवादियों का या वेस्टेड इंटरेस्ट का था, जो देश के ख़िला़फ साज़िश कर रहे हैं. जिस तरह से लोग अभी कुछ साल पहले संसद में घुस गए और हमारे कई बहादुर सिपाहियों की मौत हुई. मान लीजिए, घुसने वाले ज़्यादा होते और वे संसद के अंदर चले जाते. सारे मिनिस्टर्स, प्राइम मिनिस्टर, एमपी वहां थे. उन्हें मारने लगते तो सिवाय सेना के कोई चारा नहीं था, जो वहां पर मूव करती. दूसरी चीज़, दिल्ली में ही प्रधानमंत्री हैं, राष्ट्रपति हैं. यह साज़िश हो सकती है किसी की. सेना अपने आपको इस तरह की सिचुएशन का सामना करने के लिए टाइम टू टाइम, अचानक एक्सरसाइज करती रहती है और यह सेना का धर्म है, उसका फर्ज़ है. सेना को सबसे ज़्यादा दिक्क़त तब आती है, जब जाड़े होते हैं, धुंध होती है, कोहरा होता है. उस समय एयरफोर्स का कोई सपोर्ट सेना को नहीं मिल पाता. ये टुकड़ियां, जो स्ट्राइकर टुकड़ियां होती हैं, दिल्ली से थोड़ी दूर रखी जाती हैं, लेकिन हमेशा यह देखा जाता है कि किस समय गर्मी हो, जाड़ा हो, बरसात हो और धुंध हो. बाक़ी एक्सरसाइज तो हो चुकी थीं, लेकिन यह धुंध वाली एक्सरसाइज नहीं हुई थी. जब विशेषज्ञों ने यह बताया कि उस दिन बहुत कोहरा रहेगा, धुंध रहेगी. इसलिए यह एक्सरसाइज उस दिन तय की गई कि उस समय ट्रुप्स को दिल्ली आने में कितना समय लगता है, किसी भी अकल्पनीय स्थिति का सामना करने के लिए. टुकड़ियां आगरा और हिसार से दिल्ली की तऱफ चलीं. ये टुकड़ियां दो घंटे के नोटिस पर मूव कर सकती हैं. इन टुकड़ियों की ट्रेनिंग ऐसी होती है कि इन्हें तैयार होने में कोई व़क्त नहीं लगता. ये हमेशा तैयार रहती हैं, पर मैक्सिमम इनके लिए 2 घंटे का टाइम होता है कि सब कुछ तैयार करके ये 2 घंटे के भीतर उस ट्रबल एरिया की तऱफ मूव कर जाएं, अगर सरकार या देश की साख के ऊपर अगर कोई हमला करता है. शेखर गुप्ता को उन सज्जन ने यह भी बताया कि उस एक्सरसाइज में हमें कई माइनस प्वाइंट नज़र आए. मसलन, टुकड़ी कहीं है, हथियार कहीं हैं. यह पता चला कि आप कहां से कहां आ सकते हैं, आपको यह सपोर्ट मिल सकता है या नहीं. यह बहुत ही रिगरस एक्सरसाइज़ हुई और पता चल गया कि हमें अपनी किन-किन खामियों को दूर करना है. उन दोनों ट्रुप्स को जो टास्क दिए गए थे, जैसे ही वे टास्क खत्म हुए, उन ट्रुप्स को कह दिया गया कि नाउ गो बैक. उन्हें एक रात रुकने के लिए कहा गया, उसके बाद उन्हें जाने के लिए कह दिया गया. यह सेना की एक्सरसाइज़ थी. लेकिन वे लोग, जो सेना की साख खत्म करना चाहते थे और सेना की साख खत्म करने में मीडिया को अपना हथियार बनाना चाहते थे, उन्होंने इसे दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने की साज़िश के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया. किसी अख़बार और टेलीविज़न चैनल ने इसके ऊपर भरोसा नहीं किया. स़िर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने इसके ऊपर भरोसा किया. उसके कारण हम भी तलाश सकते हैं, लेकिन उन कारणों को ईमानदारी से सरकार को तलाशना चाहिए.
अब आपको एक और रहस्य बताते हैं. इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता ने कई वरिष्ठ अधिकारियों से बात करने की कोशिश की और चाहा कि कोई उससे यह कह दे कि हमें तो ऐसा नहीं पता, लेकिन हो भी सकता है. ऐसा हो भी सकता है, स्टोरी कंफर्मेशन के रूप में छाप दिया जाए. इस सिलसिले में यह संवाददाता नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर के दफ्तर तक गया. उन्होंने इंटरव्यू देने से मना कर दिया, टाइम देने से मना कर दिया. स्टोरी इसके बाद भी रखी रही. संदेह तब होता है, जब सबसे बड़े अधिकारियों में से एक से शेखर गुप्ता ने यह बातचीत कर ली और उन्होंने इसकी सच्चाई शेखर गुप्ता को बता दी, तब यह स्टोरी 4 अप्रैल को क्यों छपी. यह सच्चाई 22 मार्च को दोपहर के खाने के समय शेखर गुप्ता को उस अधिकारी ने बताई, जहां वह थे और मैं था और जिस पर शेखर गुप्ता ने ऐसा कोई सवाल नहीं पूछा था या ऐसा कोई रिएक्शन नहीं दिया था कि उन्हें उसकी बात पर कोई भरोसा नहीं है. मैं यहां सवाल उठाता हूं कि आप छोटे-मोटे लोगों से बातचीत करते हैं कि यह बात सही है या ग़लत, आपको कोई जवाब नहीं मिलता, लेकिन आप जब सबसे बड़े अधिकारी, चाहे प्रधानमंत्री हों, रक्षा मंत्री हों या रक्षा सचिव हों या सेनाध्यक्ष हों, जब इनसे पूछ लेते हैं कोई बात और वे कह देते हैं कि नहीं, आपके पास जो ख़बर आई है, वह बिल्कुल ग़लत है. तब फिर आप उस ख़बर को सही बनाकर छापते हैं तो यह मानना चाहिए कि कोई बहुत बड़ी ताक़त है, जो इन चारों से बड़ी है और आपसे काम करा रही है. वह हथियारों की लॉबी है? अमेरिका है? अंडरवर्ल्ड है? क्या है? इसका जवाब हम शेखर गुप्ता से सार्वजनिक रूप से मांगना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने इस देश में अविश्वास का वातावरण जानबूझ कर पैदा किया है.
ब्रजेश मिश्रा ने कहा कि जनरल को समय पूर्व सैक कर देना चाहिए. ज़रूर सैक कर देना चाहिए, लेकिन ब्रजेश मिश्रा को तो चौराहे पर खड़ा करके पब्लिकली मुक़दमा चलाना चाहिए कि आप तो डी पी मिश्रा के पुत्र हो, वह तो बड़े देशभक्त थे. सेना की यह हालत आपके समय भी थी, आपने जनता को क्यों नहीं बताया? आपने यह खतरनाक सच क्यों देश से छुपाकर रखा? सेना की हालत ठीक करने के लिए आपने किया क्या? कितने लाख करोड़ रुपये में ईमान बिका था एनडीए सरकार का? देशभक्त बनते हैं, लेकिन आप लोगों को देश की हालत नहीं बताते.
अब सवाल टाइमिंग का. दो चीज़ों की टाइमिंग के ऊपर सवाल उठे हैं. एक जनरल वी के सिंह ने भ्रष्टाचार की बात कहने के लिए क्यों 23 तारी़ख को चुना? क्योंकि वह मेरा ही इंटरव्यू था और हिंदू का इंटरव्यू था, जिसने देश के सामने जनरल वी के सिंह की इस बात को रखा कि भ्रष्टाचार है और उन्हें 14 करोड़ रुपये घूस की पेशकश की गई. मेरे इंटरव्यू की चर्चा इसलिए हुई, क्योंकि मैंने कैमरे के सामने उनका इंटरव्यू लिया था. जनरल वी के सिंह सा़फ-सा़फ कहते हुए दिखाई दिए. अ़फसोस की बात यह है कि जनरल वी के सिंह ने इस भ्रष्टाचार के जैसी बहुत सारी बातें इस इंटरव्यू में कहीं, जो उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मीडिया ने स़िर्फ रिश्वत वाली बात को उठाया, बाक़ी बातों को नहीं उठाया. वह इंटरव्यू हमारी वेबसाइट : www.chauthiduniya.com पर उपलब्ध है. जो चाहें, इसे देख सकते हैं. यह पत्रकारिता के इतिहास का अच्छा इंटरव्यू है. इसलिए नहीं कि इसे मैंने लिया है, बल्कि इसलिए, क्योंकि इस इंटरव्यू ने देश के सामने कई सारे खुलासे किए हैं. अब तक जो लोग सेनाध्यक्ष से इंटरव्यू लेते रहे, उनमें से ज़्यादातर लोग वे पत्रकार हैं, जो डिफेंस को कवर करते हैं और यह आम तौर पर माना जाता है कि डिफेंस के 70-75 प्रतिशत पत्रकार किसी न किसी लॉबी को रिप्रेजेंट करते हैं. वे सवाल भी ऐसे ही पूछते हैं, ताकि उनकी लॉबी को फायदा हो. किसी ने अब तक जनरल वी के सिंह से सेना में भ्रष्टाचार, हथियारों की खरीद में भ्रष्टाचार जैसा सवाल पूछा ही नहीं. पूछा भी तो इस तरह, जिसके पूछने का कोई मतलब ही नहीं था. इसलिए जनरल वी के सिंह ने जवाब नहीं दिया. आप जब वह इंटरव्यू फिर से देखेंगे तो यह पता चलेगा कि बिना हिचक किस तरह एग्रेसिव ढंग से मैंने सीधा सवाल पूछा और जनरल वी के सिंह ने उसका सीधा जवाब दिया. सवाल ही ऐसा था कि उसमें टालमटोल की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए जनरल वी के सिंह को जवाब देना पड़ा. इसलिए जो लोग टाइमिंग पर सवाल उठाते हैं, उनकी मंद बुद्धि पर मुझे हंसी आती है. अगर आप सही सवाल नहीं पूछेंगे तो सामने वाला आपको जवाब कैसे देगा. अब दूसरी टाइमिंग का सवाल, शेखर गुप्ता की स्टोरी का. शेखर गुप्ता ने क्यों चार अप्रैल को इस स्टोरी को छापा? इससे पहले एक बड़ा खुलासा देश में हुआ. खुलासा था सेनाध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी गई चिट्ठी के लीक होने का, जिसमें जनरल वी के सिंह ने प्रधानमंत्री को यह लिखा था कि सेना की हालत खराब हो गई है, हमें इसके ऊपर फौरन ध्यान देना चाहिए. उस चिट्ठी को लेकर पत्रकारों और खासकर टीवी और प्रिंट मीडिया ने एक शोर मचा दिया कि जनरल वी के सिंह देशद्रोह का काम कर रहे हैं और उन्होंने यह चिट्ठी खुद लीक की है. संसद में जनरल वी के सिंह को देशद्रोही कहा गया. आरजेडी के सांसद राम कृपाल यादव की ज़ुबान कुछ ज़्यादा चल गई. उन्होंने कहा कि जनरल वी के सिंह देशद्रोही हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए. जितने पुराने रक्षा मंत्री थे, खड़े हो गए. शिवानंद तिवारी खड़े हो गए और जनरल वी के सिंह को फांसी देने की मांग करने लगे. शरद यादव खड़े हो गए. ये सारे वे लोग हैं, जिनके दिमाग़ के ऊपर देश भरोसा करता है, लेकिन पहली बार इन्होंने बताया कि इनके पास दिमाग़ है ही नहीं. मैं यह इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि ये बेशर्मी के साथ चुप रहे. जब 2 अप्रैल को आईबी ने यह घोषणा कर दी कि इस खत के खुलासे में जनरल वी के सिंह का कोई हाथ नहीं है. इस खबर को टेलीविजन चैनलों ने दबाया, इस खबर को अ़खबारों ने दबाया. 3 तारी़ख को आईबी ने फॉर्मल लेटर सेना को भेज दिया कि सेना मुख्यालय से कोई पत्र लीक नहीं हुआ है, हमने पूरी जांच कर ली है. शरद यादव, लालू यादव, शिवानंद तिवारी एवं राम कृपाल यादव की ज़ुबान को लकवा मार गया. उन्हें मा़फी मांगनी चाहिए थी कि उन्होंने क्यों इतनी गैर ज़िम्मेदाराना बात संसद का सदस्य होते हुए कही. अगर अरविंद केजरीवाल जैसा आदमी कहता है कि वहां ग़ैर ज़िम्मेदार लोग हैं तो क्या ग़लत कहता है. यहीं से इस स्टोरी की टाइमिंग तय होती है. अब अगर चिट्ठी लीक हुई तो वह स़िर्फ दो जगह से लीक हो सकती है, जिसे चिट्ठी लिखी गई और जिसे चिट्ठी की कॉपी भेजी गई. चिट्ठी प्रधानमंत्री को लिखी गई, कॉपी (सीसी) रक्षा मंत्री को भेजी गई. अगर सेनाध्यक्ष के दफ्तर से यह चिट्ठी लीक नहीं हुई तो फिर जांच प्रधानमंत्री कार्यालय और रक्षा मंत्री के कार्यालय की तऱफ जाती है. साज़िश करने वालों को जब यह लगा कि अब मीडिया का ध्यान इस चिट्ठी के लीक करने वाले देशद्रोहियों पर जाएगा, तब उन्होंने यह चाल चल दी. इसके अलावा साज़िश करने वालों को एक और चिंता थी. कुछ लोग, जिनमें रिटायर्ड सैन्य अधिकारी और रिटायर्ड जनरल शामिल हैं, सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल देने की कोशिश कर रहे थे. इस पीआईएल में अगले थल सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह पर कई सवाल उठाए गए हैं. साज़िश करने वालों को लगा कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस पीआईएल को स्वीकार कर लेता है तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी. इसलिए इस पीआईएल से मीडिया और देश की जनता का ध्यान हटाना ज़रूरी था. यह दिन के उजाले की तरह सा़फ है कि देश का ध्यान इन सवालों से हटाने के लिए इंडियन एक्सप्रेस में उस खबर को छपवाया गया, जिसका 22 मार्च को देश के सबसे आधिकारिक व्यक्तियों में से एक ने व्यक्तिगत रूप से शेखर गुप्ता से खंडन कर दिया था. फिर क्यों शेखर गुप्ता ने उसमें अपना नाम जोड़ा. यही सवाल शेखर गुप्ता से मैं उनसे जूनियर होने के नाते, लेकिन उनकी इज्ज़त करने वाला पत्रकार होने के नाते और सुरेंद्र प्रताप सिंह द्वारा मिलवाए जाने की लिबर्टी लेते हुए पूछना चाहता हूं कि 22 तारी़ख को जब आपको पता चल गया और 2 अप्रैल को जब आईबी का खुलासा आ गया तो क्यों आपने यह स्टोरी की. इस स्टोरी को किसी अ़खबार ने नहीं किया. अगर शेखर गुप्ता चाहेंगे तो मैं पांच ऐसे पत्रकारों का नाम बता दूंगा, जिनके पास यह स्टोरी गई थी.
इस कहानी के पीछे की कहानी के दो और हिस्से हैं. मैं आपको बता रहा हूं कि शेखर गुप्ता साहब ने ऐसा क्यों किया. कहते हैं कि दोस्ती लोगों से न जाने क्या-क्या करा देती है. कांग्रेस की बड़ी नेता हैं किरन चौधरी. वह हरियाणा सरकार में मंत्री हैं और उनकी बेटी श्रुति चौधरी है, जो सांसद है. किरन चौधरी शेखर गुप्ता की बहुत अच्छी दोस्त हैं और तेजेंद्र सिंह की फर्स्ट कजिन यानी चचेरी बहन हैं. यह तेजेंद्र सिंह वही हैं, जिनका आदर्श सोसाइटी में फ्लैट हैं, जिनके खिला़फ जनरल वी के सिंह ने कार्रवाई की थी. यह वही तेजेंद्र सिंह हैं, जिन्होंने जनरल वी के सिंह के खिला़फ मानहानि का दावा किया है. मैंने अपने इंटरव्यू में जनरल वी के सिंह पर आरोप लगाया था कि आपने बेवजह आदर्श मामले में कार्रवाई करके सेना के कई पुराने अध्यक्षों, जैसे जनरल दीपक कपूर और कई अधिकारियों की इज्ज़त खराब की. उसका उन्होंने उस इंटरव्यू में जवाब दिया है. आदर्श सोसायटी में तेजेंद्र सिंह का फ्लैट है. घूस देने का मामला जब गरमाया, तब तेजेंद्र सिंह जनरल वी के सिंह और चार अन्य अ़फसरों के खिला़फ कोर्ट में मानहानि का मुक़दमा लेकर गए कि मैंने तो उन्हें घूस ऑफर ही नहीं की, लेकिन तेजेंद्र सिंह ने रक्षा मंत्री के खिला़फ मुक़दमा नहीं किया. मज़ेदार बात यह है कि इस इंटरव्यू में जनरल वी के सिंह ने किसी का नाम नहीं लिया. उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्हें किस शख्स ने घूस देने की कोशिश की. तेजेंद्र सिंह का नाम राज्यसभा में पहली बार रक्षा मंत्री ने लिया. इसलिए हम कह सकते हैं कि चोर की दाढ़ी में तिनका. आखिर तेजेंद्र सिंह को ऐसी क्या आग लग गई थी या उन्हें मिर्ची लग गई थी कि उन्होंने अपने को खुद दलाल मान लिया कि आरोप उन्हीं के खिला़फ लगा था.
अब कहानी का दूसरा हिस्सा. वह कौन सी ताक़त है, जो प्रधानमंत्री को लिखी गई चिट्ठी लीक करके भारतीय सेना को शर्मिंदा करना चाहती है. यह पहली चिट्ठी जनरल वी के सिंह ने प्रधानमंत्री को नहीं लिखी थी. यह सातवी या आठवीं चिट्ठी थी. जनरल वी के सिंह लगातार प्रधानमंत्री से कह रहे थे कि सेना की स्थिति खराब है, इसे ठीक कीजिए. यह हालत दो सालों में नहीं हुई, यह पिछले 15 सालों में हुई. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है और मेरी इंवेस्टीगेशन बताती है कि नरसिम्हाराव से लेकर देवगौड़ा तक और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर अभी मनमोहन सिंह तक बहुत सारे ऐसे लोग इसमें इन्वॉल्व रहे हैं, जिनकी वजह से सेना की यह हालत हुई. हर साल एक लाख करोड़ से ज़्यादा का बजट सेना के लिए होता है. पिछले 15 सालों से यह बजट लगातार हर साल खर्च किया गया. सेना की यह हालत क्यों है? ब्रजेश मिश्रा ने कहा कि जनरल को समय पूर्व सैक कर देना चाहिए. ज़रूर सैक कर देना चाहिए, लेकिन ब्रजेश मिश्रा को तो चौराहे पर खड़ा करके पब्लिकली मुक़दमा चलाना चाहिए कि आप तो डी पी मिश्रा के पुत्र हो, वह तो बड़े देशभक्त थे. सेना की यह हालत आपके समय भी थी, आपने जनता को क्यों नहीं बताया? आपने यह खतरनाक सच क्यों देश से छुपाकर रखा? सेना की हालत ठीक करने के लिए आपने किया क्या? कितने लाख करोड़ रुपये में ईमान बिका था एनडीए सरकार का? देशभक्त बनते हैं, लेकिन आप लोगों को देश की हालत नहीं बताते. आप संयुक्त राष्ट्र संघ में इतने दिन रहे, आप अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे, आप सबसे बड़े ब्यूरोक्रेट थे. आपको यह ज़रूर नज़र आया होगा और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि आपको यह पता नहीं था कि भारतीय सेना की हालत कितनी खराब है. आपका न बताना यह संदेह पैदा करता है कि आपने करोड़ों लाख रुपये घूस लिए और नहीं तो आप इसका कारण बताइए कि आपने इसलिए देश के सामने इस सच्चाई को नहीं रखा. क्या कारण है कि भारतीय सेना की इस हालत के खुलासे पर आपने भारतीय सेनाध्यक्ष को समय पूर्व रिटायर करने की मांग की. शायद इसलिए जितने पुराने रक्षा मंत्री हैं, जितने पुराने सेनाध्यक्ष हैं, सब तिलमिला गए कि कहीं यह देश 1992 के बाद से अब तक सारे रक्षा सौदों की जांच की मांग न कर दे. हर साल 1 लाख करोड़ रुपये हथियारों के ऊपर खर्च हुए, वे किसकी जेब में गए? अगर भारतीय सेना की, हथियारों की यह हालत है तो एक तऱफ चीन है तो दूसरी तऱफ पाकिस्तान है. इस बुनियादी सवाल को कोई नहीं उठा रहा. इसलिए, क्योंकि इस बुनियादी सवाल में जितने नाम मैंने लिए हैं, उनमें ज़्यादातर इस गड़बड़ी के हिस्सेदार हैं. इस गड़बड़ी का अंजाम यह है कि अब चीन भारत को धमकी दे रहा है कि साउथ चाइना सी में तेल ढूंढने का काम बंद करो, नहीं तो अंजाम खराब होगा. ब्रजेश मिश्रा जैसे लोग अगर देश को गुमराह करने में लगे रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं, जब बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे देश भी भारत को धमकियां देने लग जाएंगे. अब तीसरा सवाल यह है कि वह कौन सी ताक़त है, जिसने इस चिट्ठी को लीक कराया. जिसने लीक कराया, उसने दो काम किए. पहला काम उसने दुश्मनों को यह बता दिया कि भारतीय सेना भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की वजह से कितनी कमज़ोर हो गई है, जिसमें सेना के पिछले भ्रष्ट जनरल भी शामिल हैं. किसी का आदर्श में फ्लैट है, किसी ने कहीं ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया है, किसी ने विदेश में घर ले लिया है. एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल, जिसकी आमदनी कुछ हज़ार रुपये है, वह इस समय मर्सिडीज ई-क्लास में घूमता है, जिसकी क़ीमत 65 लाख रुपये से शुरू होती है. सरकार की आंखें बंद हैं कि रिटायरमेंट के बाद कोई कैसे जी रहा है, चाहे वह जैसे भ्रष्टाचार करे. फिर वह टेलीविजन पर आता है, पत्रकार को खिलाता-पिलाता है और पत्रकार उसकी स्टोरी दिखाता है, उसे ग्लैमराइज करता है. यह है हमारा मीडिया. मैं जिस स्टोरी के बारे में आपको बता रहा हूं, एक-एक चीज़ का सबूत मेरे पास है. उस लेफ्टिनेंट जनरल का नाम मेरे पास है, जो ई-क्लास मर्सिडीज में घूम रहा है रिटायर होने के बाद. उसने दूसरा फायदा हथियार के सौदागरों का किया. अब सारी दुनिया की हथियार फैक्ट्रियों ने इस खत के लीक होते ही प्राइस बढ़ा दिए हैं और देश में ज़्यादा घूस ऑफर होने लगी है. जैसे ही जनरल वी के सिंह रिटायर होकर अपने घर जाएंगे, आगे आने वाले कई जनरल, भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट और भ्रष्ट राजनीतिज्ञ मिलकर इस देश में दलाली की नई महागाथा लिखेंगे. अगर यह नहीं होता है तो संसार का यह सबसे आश्चर्यजनक कारनामा होगा.
यह है इस देश की अंदरूनी हालत की महागाथा, जिसमें भ्रष्टाचार, दलाली, टे्रचरी एवं देशद्रोह सब शामिल है. अब प्रधानमंत्री कार्यालय और रक्षा मंत्री कार्यालय के लिए कोई जांच की मांग नहीं कर रहा कि पत्र कैसे लीक हुआ. लोग समझते थे कि वे आईबी को ब्राइब कर लेंगे और आईबी कोई न कोई गोलमोल जवाब देगी और जनरल वी के सिंह को ब़र्खास्त कर दिया जाएगा, लेकिन अब सब खामोश हैं और बात आगे न बढ़े, इसकी कोशिश कर रहे हैं. हमारा महान सुप्रीम कोर्ट, जिससे न्याय मांगने जाते हैं, वह न्याय नहीं देता. वह कहता है कि आपस में फैसला कर लो. उसने जनरल वी के सिंह बनाम सरकार के जन्म तिथि विवाद पर यही कहा कि हम कुछ नहीं कहेंगे, आप आपस में ही फैसला कर लीजिए. आपस में फैसला करने की उस राय पर सरकार खामोश है और जनरल वी के सिंह को समय से आठ महीने पहले प्रीमेच्योर रिटायरमेंट दे रही है. सरकारी काग़ज़ों में 1951 ही दर्ज है, सरकार क़ानूनन अभी 1950 कर नहीं सकती, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है कि जन्म तिथि हाईस्कूल सर्टिफिकेट के अनुसार होगी. हाईस्कूल का सर्टिफिकेट 1951 कह रहा है, इसलिए सरकार अपने आदेश से उसे 1950 कर नहीं सकती, पर वह चाहती है कि जनरल वी के सिंह रिटायर हो जाएं. अभी सुप्रीम कोर्ट में रिटायर जनरल्स ने, जिनमें नौ सेना, वायु सेना, थल सेना और ब्यूरोक्रेसी के वरिष्ठ अफसर शामिल हैं, एक पीआईएल दाखिल की है. देखना है, उस पीआईएल में क्या फैसला होता है. आशा की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस बार सभी सवालों पर अपनी सा़फ राय देगा और इसमें जनरल वी के सिंह की जन्म तिथि भी शामिल है. मैं इस रिपोर्ट को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ लिख रहा हूं और मैं शेखर गुप्ता से इस रिपोर्ट को लिखने के लिए कोई मा़फी नहीं मांगूगा. मैं शेखर गुप्ता को सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि आपकी एक तस्वीर थी, जो मैंने 1982 से बना रखी थी. आपको मैं देखता था, आपको मैं एडमायर करता था. वैसे ही एडमायर करता था, जैसे श्री सुरेंद्र प्रताप सिंह को हमेशा करता रहा था. आप उनके दोस्त थे और वह आपकी तारी़फ करते थे. लेकिन आपने अपनी तस्वीर एक सेकेंड में तोड़ दी और इंडियन एक्सप्रेस की तस्वीर तो आपने करोड़ों हिंदुस्तानियों के मन से तोड़ दी और यह पता चला कि हर चीज़ की एक क़ीमत है. चाहे वह इंडियन एक्सप्रेस ही क्यों न हो, उसकी भी एक क़ीमत है.
जो लिखा नहीं गया
शेखर गुप्ता साहब के इंडियन एक्सप्रेस की इस पूरी कहानी के दो हिस्से और हैं. पहला हिस्सा, जब प्रधानमंत्री कोलकाता गए थे, तब वहां उनके साथ इस सारी कहानी के जनक भूतपूर्व सेनाध्यक्ष और अब राज्यपाल जनरल जे जे सिंह रात का खाना खाने के लिए स्पेशली उड़ कर कोलकाता आए थे. उस डिनर में, जो प्रधानमंत्री जी की बहन के घर हुआ था, लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह, जो ईस्टर्न कमांड के हेड हैं और कोलकाता उनका हेडक्वॉर्टर, वह भी उस डिनर में शामिल थे. इस डिनर का रिकॉर्ड कोलकाता पुलिस के पास है, क्योंकि जनरल जे जे सिंह और ले. जनरल बिक्रम सिंह का मूवमेंट पुलिस ने रिकॉर्ड किया था. ले. जनरल बिक्रम सिंह भारत के होने वाले सेनाध्यक्ष हैं. उन्हें उस डिनर में जाने से शायद बचना चाहिए था, क्योंकि उस समय भारतीय सेना में का़फी हलचल हो रही थी और एक-दूसरे पर शक-ओ-शुब्हा बढ़ रहा था. लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह को एहतियात बरतने की ज़रूरत इसलिए थी, क्योंकि वहां प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौजूद थे. इससे उन अ़फवाहों को भी बल मिलता है कि मनमोहन सिंह जनरल बिक्रम सिंह को सेनाध्यक्ष बनवाना चाहते हैं और जिसके लिए उन्होंने सरकार की साख दांव पर लगा दी है. सेना के बड़े अधिकारियों के राजनीतिक अधिकारियों से अनौपचारिक तरीक़े से मिलने-जुलने को प्रजातंत्र में वैसे भी ठीक नहीं माना जाता है. इससे अ़फवाहों का बाज़ार गरम होता है.
इंडिया टुडे का सच
इस साज़िश का एक और अहम हिस्सा. इंडिया टुडे ने जनरल वी के सिंह के खिला़फ कवर स्टोरी छापी. इंडिया टुडे ग्रुप का दैनिक अ़खबार मेल टुडे, जिसके पहले भारत भूषण एडिटर थे और अब उन्होंने शायद इसीलिए इस्ती़फा दे दिया, क्योंकि उनसे वह करने को कहा जा रहा होगा, जो वह नहीं करना चाहते थे, जो ग़लत था. इस समूह ने एक कैंपेन चला रखा है. जिस बातचीत को हमने छापा, उसमें उन्नीथन का नाम है. यह उन्नीथन संदीप उन्नीथन हैं, जो इंडिया टुडे में जनरल के खिला़फ कवर स्टोरी करते रहे हैं. संदीप उन्नीथन के खिला़फ एक एफआईआर हुई है, क्योंकि उन्होंने पत्रकार रहते हुए एक फ्रॉड किया और एक ग़लत सर्टिफिकेट जनरल वी के सिंह की जन्म तिथि का, पुणे के आर्मी हॉस्पिटल से बनवाया, जिसमें जनरल वी के सिंह की जन्म तिथि सन् 49 बताई गई है. इस कहानी के पीछे की कहानी कुछ और है. इंडिया टुडे के पास एक बड़ी स्टोरी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिला़फ आई. यह स्टोरी नितिन गडकरी के करियर को बर्बाद कर सकती थी. इंडिया टुडे यह स्टोरी नहीं करना चाहता था, वह नितिन गडकरी को बचाना चाहता था. इसलिए इंडिया टुडे में फैसले लेने वाले लोगों ने तय किया कि अभी जनरल वी के सिंह एक ऐसे बकरे हैं, जिन्हें आसानी से काटा जा सकता है, जिनकी बलि दी जा सकती है. इसलिए गडकरी की जगह जनरल वी के सिंह का सवाल उठाओ. इसलिए वह स्टोरी की गई. जब स्टोरी हो गई, तब उन्नीथन से जनरल तेजेंद्र सिंह ने रिटायर होने के बाद संपर्क कर लिया और वहां से हरेक ने अपने-अपने हित के हिसाब से काम करना शुरू कर दिया. संदीप उन्नीथन पहले जिस ऑर्गेनाइजेशन में थे, शायद न्यूज एक्स में थे, वहां से वह क्यों हटाए गए, इस बारे में न्यूज एक्स वाले कई कहानियां बताते हैं. शायद जिस वजह से वह वहां से निकाले गए, उसी वजह से इंडिया टुडे में रख लिए गए.
क्या एक केंद्रीय मंत्री इस साजिश में शामिल हैं
इंडियन एक्सप्रेस की स्टोरी छपते ही देश में हंगामा मच गया. विशेषज्ञों ने इसे पढ़ते ही खारिज कर दिया. वजह सा़फ है कि भारत की सेना पाकिस्तान की सेना नहीं है, जो प्रजातंत्र को मारकर अपना शासन चलाने में विश्वास रखती हो. वह भी ऐसे समय में, जब सेना की कमान जनरल वी के सिंह जैसे ईमानदार अ़फसर के हाथ में हो. जनरल वी के सिंह तो ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस सरकार को एक ग़लती करने से रोका. नक्सलियों के खिला़फ सरकार सेना का इस्तेमाल करना चाहती थी. जनरल वी के सिंह से जब राय ली गई तो उन्होंने सा़फ मना कर दिया कि देश की सेना देश के नागरिकों पर गोली नहीं चलाएगी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट प्रजातांत्रिक मूल्यों को धर्म की तरह मानने वाले जनरल वी के सिंह को बदनाम करने की एक विफल कोशिश है, लेकिन एक सवाल सबके दिमाग़ में घूमने लगा कि शेखर गुप्ता जैसे महान एडिटर ने इस तरह की स्टोरी कैसे कर दी? ज़रूर कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसकी बातों पर शेखर गुप्ता भगवान से भी ज़्यादा विश्वास करते हैं. वह व्यक्ति कौन हो सकता है? इंडियन एक्सप्रेस की खबर आते ही एक अ़खबार में एक दूसरी रिपोर्ट छपी. इस अ़खबार का नाम संडे गार्जियन है. इस अ़खबार से बहुत बड़े-बड़े पत्रकार और नाम जुड़े हुए हैं. इस अ़खबार की रिपोर्ट ने इंडियन एक्सप्रेस
आरजेडी के सांसद राम कृपाल यादव की ज़ुबान कुछ ज़्यादा चल गई. उन्होंने कहा कि जनरल वी के सिंह देशद्रोही हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए. जितने पुराने रक्षा मंत्री थे, खड़े हो गए. शिवानंद तिवारी खड़े हो गए और जनरल वी के सिंह को फांसी देने की मांग करने लगे. शरद यादव खड़े हो गए. ये सारे वे लोग हैं, जिनके दिमाग़ के ऊपर देश भरोसा करता है, लेकिन पहली बार इन्होंने बताया कि इनके पास दिमाग़ है ही नहीं. मैं यह इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि ये बेशर्मी के साथ चुप रहे. जब 2 अप्रैल को आईबी ने यह घोषणा कर दी कि इस खत के खुलासे में जनरल वी के सिंह का कोई हाथ नहीं है.
की कहानी के पीछे उस शख्स को तलाशने की कोशिश की. आइए देखते हैं इस अ़खबार में क्या छपा, 4 अप्रैल को एक अंग्रेजी दैनिक के मुख्य पृष्ठ पर तख्ता पलट से संबंधित संदेहास्पद और सनसनी़खेज़ खबर का खुलासा करने वाले सूत्रों ने दावा किया है कि अंग्रेजी दैनिक के मुख्य पृष्ठ पर छपी इस खबर के पूरे घटनाक्रम में यूपीए सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री का हाथ है. सूत्रों का दावा है कि मंत्री अपने एक क़रीबी रिश्तेदार के साथ सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह का विरोध कर रहे सैन्य खरीद की लॉबिंग करने वाले लोगों से जुड़े हैं और इस आधारहीन रिपोर्ट को राजनीतिक गलियारे में जनरल वी के सिंह को मिल रहे समर्थन को खत्म करने के उद्देश्य से इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे भारत में पाकिस्तान जैसी परिस्थितियां पैदा होने के विरोध में सभी राजनीतिक दल एकजुट हो सकते हैं. सवालों के दायरे में आए मंत्री ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्री की रिपोर्ट पर उनकी प्रतिक्रिया का ग़लत आकलन कर लिया था. मंत्री यह मान रहे थे कि दोनों लोग सेना प्रमुख के साथ रिश्तों में खटास की वजह से रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देने से इंकार कर देंगे, लेकिन इसके विपरीत दोनों ने अ़खबार के खिला़फ बयान दिए. इसने मंत्री सहित उन पत्रकारों को भी हैरानी में डाल दिया, जिन्होंने मंत्री की सूचना पर भरोसा करके खबर प्रकाशित की थी. कुछ लोगों का कहना है कि सवालों के दायरे में आए मंत्री के रिश्तेदार नियमित रूप से हथियार व्यापारियों और दलालों से मिलते रहे हैं. इसके लिए उन्होंने कई बार विदेश यात्रा भी की है. लेकिन इंटेलिजेंस ब्यूरो ऐसी गतिविधियों से अनभिज्ञ है, क्योंकि उसके जाल में प्रभावशाली व्यक्ति कभी नहीं फंसते. जो लोग राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े हैं, उनका कहना है हथियार विक्रेताओं का दायरा बहुत बड़ा है.
दुबई, लंदन और बैंकॉक तीन ऐसी जगह हैं, जहां वे अपने अवैध कामों के संरक्षण के लिए भारत के अति विशिष्ट (वीवीआईपी) लोगों का मनोरंजन करते हैं, कई लोग तो संदिग्ध रूप से पैसों का लेनदेन करते हैं. ऐसे लोग और एजेंसियां विदेशी खुफिया विभाग के लिए काम करते हैं. इन लोगों को उनके संबंधों के माध्यम से संवेदनशील और गुप्त सूचनाएं इकट्ठा करने को कहा जाता है. ये सूत्र दावा करते हैं कि नाटो देशों की कुछ अघोषित खु़फिया एजेंसियां (मुख्यत: भारतीय सैन्य हथियार खरीद बाज़ार में) नियमित रूप से दलालों और हथियार निर्माण करने वाली कंपनियों के कर्मचारियों का हनीट्रैपिंग में इस्तेमाल करती हैं. इसी संदर्भ में उनका मंत्रियों के रिश्तेदारों से गठजोड़ चिंता का विषय है. सूत्रों के हवाले से शक के दायरे में आए मंत्री की उस अंग्रेजी अ़खबार के वरिष्ठ पत्रकारों के बीच अच्छी पैठ है, जिसने तख्ता पलट की आशंका वाली खबर छापी है. सैन्य सूत्रों का कहना है कि वे उस अ़खबार द्वारा ऐसी रिपोर्ट छापे जाने से अचंभे में हैं, जिसमें उच्च स्तर पर अच्छे और योग्य पत्रकार काम करते हों. उसने एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा दी गई आधारहीन सूचना को सही मान लिया होगा. एक अन्य सैन्य सूत्र आगाह करते हुए कहते हैं कि पत्र लीक करने का उद्देश्य केवल सेना प्रमुख की विश्वसनीसता कम करना नहीं था, बल्कि सेना की प्रशिक्षण प्रक्रिया पंगु बना देना भी था. हथियार खरीदने की प्रक्रिया पहले ही कई बार रिश्वत के आरोप लगने की वजह से धीमी पड़ चुकी है. क्या सेना की नियमित अभ्यास की आज़ादी को काल्पनिक तख्ता पलट की रिपोर्ट के आधार पर कम कर देना चाहिए, लेकिन इससे सेना जल्दी ही अपनी लड़ने की क्षमता खो देगी. सैन्य सूत्रों का दावा है कि कुछ असैन्य अधिकारी भी हथियार के बिचौलियों से जुड़े हैं. उनके ज़रिए वे विदेशी खुफिया एजेंसियों से जुड़े हैं और ये लोग सेना को दी गई मूवमेंट का आज़ादी भी छीन लेना चाहते हैं. नेहरू के समय से ही सैन्य और असैन्य प्रशासन को अलग-अलग रखने की नीति रही है. कोई भी उस वरिष्ठ मंत्री पर आरोप नहीं लगा रहा है, जो सेना की छवि खराब करना चाहता है. सूत्र कहते हैं कि वह (मंत्री) अनजाने में हथियार माफियाओं के हाथ की कठपुतली बन गए हैं, जो न केवल यूपीए सरकार के बकाया कार्यकाल में हथियारों के बड़े ऑर्डर को पा लेने की संभावना को लेकर खुश हैं, बल्कि वे सेना के प्रशिक्षण कार्यक्रम को कमजोर करने में भी सफल हुए हैं. इससे सेना कश्मीर और उस जैसे अन्य मसलों में अप्रभावी हो सकती है. सैन्य सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री द्वारा इस खबर के खंडन से वे लोग खुश हैं, जो सेना प्रमुख के साथ किए जा रहे व्यवहार से दु:खी थे. तख्ता पलट की आशंका के पूर्ण खंडन से इस खबर को छापने वाले अ़खबार के उन लोगों को झटका लगा है, जो उस वरिष्ठ मंत्री के क़रीबी थे, जिसने सेना द्वारा तख्ता पलट की तैयारी की बात का समर्थन किया था. अ़खबार ने तख्ता पलट की कोशिश की काल्पनिक खबर असावधानी से अ़खबार के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित कर दी थी, जिसमें जनरल सिंह द्वारा मनमोहन सिंह सरकार का तख्ता पलट करने की कोशिश की बात कही गई थी. इस खबर के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में कोई प्रतिक्रिया नहीं छपी है. इंडियन एक्सप्रेस को अब चाहिए कि वह किसी टीवी चैनल की रिपोर्ट हो, चौथी दुनिया या फिर किसी दूसरे अ़खबार में छपी खबर हो, का सामना करे. उसे इस खबर की असलियत लोगों के सामने रखनी चाहिए. लोगों का पत्रकारिता से भरोसा उठ रहा है. लोगों का विश्वास कायम रखने का दायित्व शेखर गुप्ता जैसे महान पत्रकारों का भी है. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि उन्हें जनता के सामने यह बताना चाहिए कि किसके बहकावे में आकर उन्होंने यह रिपोर्ट छापी, चाहे वह हथियार माफिया हो, अधिकारी हो या फिर कोई मंत्री.
सरकार डील की जांच कराए
टेट्रा ट्रक की खरीददारी में घपलेबाज़ी की दास्तां लंबी होती जा रही है. कभी सीएजी की रिपोर्ट सामने आती है तो कभी लेफ्टिनेंट जनरल जेपी सिंह, तो कभी लेफ्टिनेंट जनरल राजिंदर सिंह की चिट्ठी मीडिया में आती है. इन खुलासों से यही पता चलता है कि रक्षा मंत्रालय में बैठे अधिकारियों को इस बारे में पहले से जानकारी थी, लेकिन सभी ज़िम्मेदार लोगों ने चुप्पी साध ली है. हैरानी होती है कि रक्षा मंत्री एके एंटनी के रहते हुए यह सब होता रहा. इसका मतलब तो यही है कि रक्षा मंत्रालय सेना के ज़िम्मेदार अ़फसरों की बातों को दरकिनार कर मनमानी करता रहा. हथियारों के दलाल, माफिया और अलग-अलग लॉबी अपनी करतूतों को अंजाम देती रही. देश की ग़रीब जनता के पैसे की लूट होती रही. इस लूट को रोकने की बजाय 2010 में जब जनरल वीके सिंह ने टेट्रा ट्रक की खरीददारी की डील पर रोक लगाई तो माफिया हथियार लॉबी और अधिकारियों का पूरा गैंग जनरल वीके सिंह के पीछे पड़ गया. अब टेट्रा ट्रक का सौदा सरकार के लिए मुश्किल बन गया है. सरकार अगर अपनी साख बचाना चाहती है तो पिछले बीस सालों में जितने भी सौदों की रक्षा मंत्रालय से डील हुई है, उसकी जांच कराए.
तेजेंद्र सिंह कौन हैं
गृह मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत आने वाली सुरक्षा एजेंसियों के लिए खरीददारी वाले लोगों का कहना है कि जनरल वी के सिंह ने रक्षा मंत्री ए के एंटनी से सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल तेजेंद्र सिंह के बारे में कहा था कि उन्होंने घूस देने की पेशकश की थी. यह बात सेना को सामान बेचने वाले लोगों से छुपी नहीं है. सूत्रों का कहना है कि तेजेंद्र सिंह सेवानिवृत्त मेजर हुड्डा और उनके बेटे के साथ मिलकर यह काम करते हैं. साथ ही यह भी जानकारी है कि इन दोनों की पहचान गृह मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्तिक चिदंबरम से भी है. मेजर हुड्डा का बेटा कई कंपनियों की वस्तुएं प्रमोट करता है, जिसमें कुछ विदेशी कंपनियां भी हैं. ऐसा कहा जाता है कि हुड्डा का संबंध हरियाणा के मुख्यमंत्री के साथ है. इन्हीं सूत्रों का कहना है कि तेजेंद्र सिंह एक पूर्व थल सेनाध्यक्ष के का़फी क़रीब रहे हैं और वह जानते हैं कि आगामी थल सेनाध्यक्ष ले. जनरल बिक्रम सिंह बहुत अच्छे हैं. इसकी छानबीन की जानी चाहिए, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि दोनों के संबंधों के कारण भविष्य में सेना के लिए होने वाली खरीददारी प्रभावित होगी. ग़ौरतलब है कि जनरल वी के सिंह ने हथियार माफियाओं के खिला़फ मोर्चा खोल दिया था. सरकार ने जनरल वी के सिंह के उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी है. सरकार को इस बात की भी स़फाई देने की ज़रूरत महसूस हुई कि ले. जनरल बिक्रम सिंह का काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन का रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है, जिसके कारण अगला सेनाध्यक्ष उन्हें ही बनाया जाना चाहिए.
एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल, जिसकी आमदनी कुछ हज़ार रुपये है, वह इस समय मर्सिडीज ई-क्लास में घूमता है, जिसकी क़ीमत 65 लाख रुपये से शुरू होती है. सरकार की आंखें बंद हैं कि रिटायरमेंट के बाद कोई कैसे जी रहा है, चाहे वह जैसे भ्रष्टाचार करे. फिर वह टेलीविजन पर आता है, पत्रकार को खिलाता-पिलाता है और पत्रकार उसकी स्टोरी दिखाता है, उसे ग्लैमराइज करता है. यह है हमारा मीडिया.
आश्चर्य की बात तो यह है कि ले. जनरल तेजेंद्र सिंह, हुड्डा और दूसरे लोगों पर सुरक्षा एजेंसियों के सामानों की खरीद के लिए किए जाने वाले निर्णय प्रभावित करने के आरोप लगाए जाने के बावजूद सीबीआई ने इसकी जांच करने में अपनी रुचि नहीं दिखाई है. इन एजेंसियों में रॉ, एनटीआरओ और एविएशन रिसर्च सर्विस शामिल हैं. इन एजेंसियों के लिए की जा रही खरीद संदेह के घेरे में है, लेकिन फिर भी इसकी जांच नहीं की जा रही है. इसे क्या कहा जा सकता है. जब तक जांच नहीं होती है, तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता है, लेकिन यह भी सा़फ है कि जांच के अभाव के कारण अभी भी कार्तिक चिदंबरम पर शक किया जा रहा है. हो सकता है कि कार्तिक पर लगाए जा रहे आरोप ग़लत हों. व्यवसाय और राजनीति में उनकी सफलता के कारण ईर्ष्या से कुछ लोग ऐसा आरोप लगा रहे हों, लेकिन इसका पता जांच के बाद लगेगा. सूत्रों का कहना है कि सरकार की एक महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी ने हुड्डा और तेजेंद्र सिंह के मामले की जांच सीबीआई और आईबी दोनों से कराने को कहा है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि दोनों के ऊपर कुछ ताक़तवर लोगों का हाथ है. जनरल सिंह ने जब इसके खिला़फ आवाज़ उठाई तो ये लोग उनके विरुद्ध हो गए और उन्हें भला-बुरा कहने लगे. हालांकि रक्षा मंत्री ने जनरल वी के सिंह का विरोध नहीं किया, लेकिन ले. जनरल बिक्रम सिंह को थल सेनाध्यक्ष के लिए सबसे योग्य दावेदार उन्होंने भी बताया. कहा जा रहा है कि ले. जनरल बिक्रमजीत सिंह के थल सेनाध्यक्ष बनने के बाद जनरल वी के सिंह द्वारा शुरू कराई गई जांच आगे नहीं बढ़ाई जाएगी. अब तो एक जून, 2012 का इंतज़ार है, जब ले. जनरल बिक्रम सिंह को थल सेनाध्यक्ष बनाया जाएगा. देखना यह है कि बिक्रम सिंह अपने ऊपर लगाए जा रहे इन आरोपों को ग़लत साबित करते हैं, माफियाओं के खिला़फ कार्रवाई करने वाले दल में शामिल होते हैं या फिर अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को सही साबित कर देते हैं.
यह रिपोर्ट पहले छप चुकी थी
इंडियन एक्सप्रेस की स्टोरी ने देश के साथ एक गंदा मज़ाक़ किया है. यह स्टोरी छपने के बाद जब इस कहानी पर टेलीविजन चैनलों पर चर्चा शुरू हुई तो पता चला कि इंडियन एक्सप्रेस के महान पत्रकारों को यह भी पता नहीं था कि सेना के लिए इस तरह की रुटीन एक्सरसाइज का़फी नॉर्मल बात है. इंडियन एक्सप्रेस की इस कहानी में दो बिंदु हैं, जिन्हें लेकर राई का पहाड़ बनाया गया. हर तऱफ से स्टोरी को बकवास बताए जाने के बाद भी शेखर गुप्ता साहब इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट को डिफेंड करते नज़र आए. उन्होंने कहा कि सभी लोगों ने इस रिपोर्ट को आधारहीन बताया, लेकिन किसी ने इसे झुठलाया नहीं. इस रिपोर्ट की दो सच्चाइयां हैं और वही दोनों आधार भी हैं. पहला यह कि 16 जनवरी को सेना की दो टुकड़ियां दिल्ली की तऱफ आईं और इंडियन एक्सप्रेस का दूसरा सच यह है कि सरकार को इस बात की जानकारी नहीं थी. इसके अलावा इस रिपोर्ट में जितनी भी बातें लिखी गई हैं, वे इधर-उधर की बातों को जोड़कर लिखी गईं. क़लम और दिमाग़ का ऐसा इस्तेमाल किया गया, जिसे देखकर गोएबल्स को भी शर्म आ जाए. यह रिपोर्ट एक ओर यह इशारा कर रही है कि सेना की योजना तख्ता पलट करने की थी, वहीं दूसरी ओर इस अ़खबार के एडिटर शेखर गुप्ता यह भी कह रहे हैं कि हमने इस शब्द को अपनी पूरी रिपोर्ट में लिखा ही नहीं. हमने तो स़िर्फ लेटर सी… लिखा था. जिसे जो समझना है, वह समझे. ऐसा लगता है कि यह रिपोर्ट इंडियन एक्सप्रेस लोगों को अप्रैल फूल बनाने के लिए एक अप्रैल को छापने वाला था, लेकिन ग़लती से 4 तारी़ख को छप गई. देश के साथ यह कोई मज़ाक़ करने का व़क्त नहीं है कि आप फ्रंट पेज पर इस तरह की स्टोरी छाप दें और यह कह दें कि मतलब आप स्वयं लगा लें. इस स्टोरी में कई खामियां हैं. पहली बात यह कि इंडियन एक्सप्रेस का कोई संवाददाता सेना की इस एक्सरसाइज का चश्मदीद नहीं था. अगर कोई चश्मदीद होता तो यह स्टोरी 17 जनवरी को छपनी थी. इस स्टोरी को सामने आने में 4 अप्रैल तक का व़क्त क्यों लग गया. इसका मतलब यह है कि इस अ़खबार को ये जानकारियां बाहर से मिलीं. इसके बाद इसे साबित करने के लिए लोगों से मुलाक़ात हुई. किसी भी व्यक्ति ने इस स्टोरी को सही नहीं बताया, वरना उसका नाम लेकर अखबार यह रिपोर्ट छाप देता. लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने इसे अपनी इंवेस्टीगेशन बताया. पत्रकारिता की सारी मर्यादाओं की सीमा लांघ कर झूठी कहानी रची गई. हक़ीक़त यह है कि जिस खबर को इंडियन एक्सप्रेस अपनी तहक़ीक़ात बता रहा है, वह कहानी पहले ही लोगों के पास आ चुकी थी. दुनिया भर में प्रसिद्ध वेबसाइट रेडिफ पर यह खबर 13 मार्च को छपी थी, लेकिन उस रिपोर्ट ने सच्चाई पेश की, राई का पहाड़ नहीं बनाया. रेडिफ के रिपोर्टर को इसमें देश में तानाशाही लागू करने के कोई सबूत नज़र नहीं आए, क्योंकि यह मामला सा़फ था कि यह एक साधारण सा सैन्य अभ्यास था. पहले आप रेडिफ में छपी रिपोर्ट को देखिए, जिसे 13 मार्च को अपलोड किया गया.
भारत की आगरा स्थित पैराशूट ब्रिगेड ने अपनी तैयारियों का जायज़ा लेने और पड़ोसी देशों को आपात स्थिति में सैन्य मदद देने के उद्देश्य से दो युद्ध कौशल के अभ्यास किए. सूत्रों के अनुसार, 50 पैरा ब्रिगेड ने दो परिस्थितियों, हाल में मालदीव में हुए कथित तख्ता पलट और दो साल पहले बांग्लादेश में बांग्लादेश राइफल्स द्वारा तख्ता पलट की कोशिश जैसी परिस्थिति में प्रतिक्रिया करने संबंधी अभ्यास किए थे. अभ्यास के दौरान ब्रिगेड जमीनी रास्ते से आगरा से राजधानी दिल्ली के मुहाने पर स्थित भारतीय वायु सेना के हिंडौन स्टेशन तक पहुंची, जहां वायु सेना ने ट्रांसपोर्ट हेलीकॉप्टर सी-130 जे की तैनाती की है. हाल में थल सेना और वायु सेना ने इस जहाज़ की किसी भी परिस्थिति में अधिक संख्या में हथियार और सैनिकों को ले जा सकने की कार्ययोजना पर काम किया था, जिसमें यह हेलीकॉप्टर सक्षम है. ऑपरेशन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अभ्यास के दौरान बहुत सी परिस्थितियों में स्थापित तरीकों से निराकरण करने पर कई जटिलताएं सामने आईं, जैसे कि सर्दियों के दौरान उत्तर भारत घने कोहरे से ढंक जाता है, इस दौरान आगरा से दिल्ली पहुंचने की रफ्तार कम हो जाती है. पैरा ब्रिगेड के जवानों ने जरूरी उपकरण और हथियार भरतपुर स्थित आयुध डिपो से लाने के दौरान इस क्षेत्र की संकरी सड़कों, ट्रैफिक और घने कोहरे से जूझते हुए काफी समय खराब कर लिया था. साथ ही पैरा ब्रिगेड को दिल्ली से हिंडौन पहुंचने के लिए 3 घंटे का समय दिया गया था, लेकिन ट्रुप ने यह दूरी तय करने में साढ़े चार घंटे का समय लिया. वास्तविक परिस्थितियों में 90 मिनट की यह देरी महंगी साबित हो सकती है. अभ्यास के दौरान उजागर हुई कमियों को ध्यान में रखते हुए सेना मुख्यालय ने आवश्यक हथियारों और गोला-बारूद की स्टोरेज फैकल्टी आगरा स्थित पैराशूट रेजीमेंट में स्थापित करने का निर्णय लिया है. पैराशूट ब्रिगेड का यह अभ्यास वास्तव में उत्तर भारत में होने वाले घने कोहरे द्वारा खड़े कर सकने वाले अवरोधों को ध्यान में रखकर किया गया था. भारत का अधिकतर सैन्य बल उत्तर भारतीय क्षेत्रों में स्थापित है. यदि उन्हें शॉर्ट नोटिस में कार्यवाही करने को कहा जाए तो कई तरह की व्यवहारिक समस्याएं आएंगी. ऐसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सैन्य टुकड़ियों को सर्दियों में घने कोहरे और ट्रैफिक के दौरान दूसरे स्थानों के लिए कूच करना चाहिए, जिससे वास्तविक परिस्थितियों में आने वाली परेशानियों का आकलन हो सके. रेडिफ की इस रिपोर्ट में तख्ता पलट की कोई बात नहीं है. फिर शेखर गुप्ता को यह कैसे नजर आ गया. टेलीविजन पर जितने भी एक्सपर्ट आए, उन्होंने सा़फ-सा़फ कहा कि इस तरह की सामान्य मिलिट्री एक्सरसाइज के लिए किसी को बताने की ज़रूरत नहीं होती है. अगर सेना इन सब चीज़ों के लिए नोटिफिकेशन करता रहे तो रक्षा मंत्रालय में इतने काग़ज़ हो जाएंगे कि पूरा दफ्तर ही भर जाए. मिलिट्री आएदिन इस तरह की एक्सरसाइज करती रहती है. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इंडियन एक्सप्रेस से एक भयंकर चूक हुई है, लेकिन शेखर गुप्ता ने जिस तरह से अपनी रिपोर्ट को डिफेंड किया, उससे कई तरह के शक पैदा होते हैं.