उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर पर है और कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण का शिग़ूफा छोड़ दिया है. कांग्रेस इसलिए, क्योंकि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री कांग्रेस के सदस्य हैं. इसलिए यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि शिगू़फा कांग्रेस ने छोड़ा है. शिग़ूफा इसलिए, क्योंकि इसमें कोई गंभीरता नज़र नहीं आती. अगर गंभीरता होती तो कई सालों तक रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में न पड़ी रहती और न सरकार दबाव में आकर इसे सदन में रखती. सरकार खुद इसे सदन के पटल पर रख सकती थी, साथ ही वह संसद को यह जानकारी देती कि उसने क्या कार्रवाई की और किस तरह रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट लागू होगी. जस्टिस सच्चर की कमेटी बनी थी. जस्टिस सच्चर ने देश को खासकर अल्पसंख्यकों के बीच व्याप्त भेदभाव के कारण बताए थे. लगभग हर मुस्लिम संगठन और नेता सच्चर कमेटी को लेकर का़फी चिंतित हुआ. रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट बीमारी का कारण नहीं, निदान बताती है, लेकिन अ़फसोस की बात यह कि रंगनाथ मिश्र कमीशन की रिपोर्ट लागू हो, इसके लिए न मुस्लिम संगठनों ने कुछ किया और न राजनीतिक दलों ने.
यह संयोग की बात है कि जब हमने इस रिपोर्ट को छापा तो कुछ सांसद जागे और राज्यसभा एवं लोकसभा में इसे लेकर हंगामा हुआ. अंतत: सरकार ने मजबूर होकर रिपोर्ट को सदन में रखा. हमने कहा था कि सरकार कहे कि यह रिपोर्ट झूठी है. सरकार ने रिपोर्ट को झूठी कहने की जगह उसे सदन में रखने का दबाव सांसदों का मान लिया. रिपोर्ट को सदन में रखे हुए भी लगभग दो साल हो गए, लेकिन सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की और न करने के लिए इच्छाशक्ति दिखाई. अब जब उत्तर प्रदेश का चुनाव सिर पर है तो सरकार कह रही है कि मुसलमानों को आरक्षण मिलेगा. बहुत सारे अंतर्विरोध हैं. क्या सभी मुसलमानों को आरक्षण मिलेगा, मुसलमानों में जो पिछड़े हैं, उन्हें आरक्षण मिलेगा या पिछड़ों में भी जो अति पिछड़े हैं, उन्हें आरक्षण मिलेगा? आरक्षण अगर मुसलमानों को मिलता है तो वह सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को ध्यान में रखते हुए मिलेगा कि 50 प्रतिशत से ज़्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता. सामान्य कोटे में से किसे निकालेंगे. यह आरक्षण सामान्य कोटे से दिया जाएगा या दलित-अनुसूचित जाति के लिए जो आरक्षण है, उसमें से दिया जाएगा, यह अभी सा़फ नहीं है.
सरकार को इस तरह के खेलों से बचना चाहिए, अगर उसे वाक़ई कुछ करना है. इस तरह के खेलों से सरकार या सरकार चलाने वाली पार्टियों को कोई फायदा मिलेगा, ऐसा दिखाई नहीं देता, क्योंकि अब मुस्लिम समाज या अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े हुए लोग उतने भोले नहीं हैं, जितने आज से 15 या 20 साल पहले थे. अब नई पीढ़ी या जो लोग जवानी से बुढ़ापे की ओर जा रहे हैं, वे तरह-तरह के बयानों का मतलब समझने लगे हैं. अगर कांग्रेस यह सोचती है कि भारतीय जनता पार्टी या उसकी विचारधारा वाली पार्टियां इस बयान का विरोध करेंगी और उसे मुसलमानों के वोटों का लाभ मिल जाएगा तो शायद वह ग़फलत में है. भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को भी मालूम है कि यह स़िर्फ एक शिगू़फा है. उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि वे इसे चाहे जितना उछालें, उन्हें ग़ैर मुस्लिम वोटों का बहुत फायदा नहीं होने वाला है, क्योंकि इस देश में रहने वाले, चाहे वे मुस्लिम समुदाय के लोग हों, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हों या बहुसंख्यक हों, सभी लोग राजनीतिक दलों की चालों को थोड़ा-बहुत समझने लगे हैं. राजनीतिक भाषा का अर्थ उन्हें पता चल गया है. इससे स़िर्फ इतना हो सकता है कि छोटे तबक़ों को भरमा कर आप अखबारों में बयान दिला सकते हैं, इससे ज़्यादा और कुछ नहीं हो सकता.
होना यह चाहिए कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग यानी मुसलमानों को महसूस हो कि हम उनकी परेशानियों से वाक़ि़फ हैं, यह मुल्क उनकी चिंताओं को समझता है और उन्हें अपने बराबर लाने के लिए कुछ नए उपाय भी सोच सकता है. इसके लिए 2006 से अभी तक इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं थी. लगभग चार साल से ज़्यादा का व़क्त गुज़र गया, सरकार, संसद और राजनीतिक दल अगर गंभीर होते तो अब तक कुछ न कुछ उपाय लागू करने की घोषणा हो चुकी होती. दरअसल यह पूरा तंत्र न केवल अमानवीय तंत्र में बदल रहा है, बल्कि उसने लोगों की परेशानियों, तकली़फों से चिंतित होना भी छोड़ दिया है. इसका सबसे भयंकर नतीजा यह निकल रहा है कि देश के दबे-कुचले वर्ग में से कई सारे नौजवान देश, देशभक्ति और देश के प्रति अपने कर्तव्य की सीमाएं भूलने लगे हैं. उन्हें लगता है कि जब मुल्क में रहने वाले लोग, दूसरे शब्दों में मुल्क को चलाने वाले लोग उनकी तकलीफों के ऊपर ध्यान नहीं देते, तो उनके लिए इस मुल्क को अपना कहना कितना जायज़ है. ऐसी भावना अगर मुल्क के थोड़े से लोगों में भी पैदा हुई है, तो यह हम सभी की असफलता है और खतरनाक भी. पर दुर्भाग्य की बात यह कि ऐसा हो रहा है.
भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को भी मालूम है कि यह स़िर्फ एक शिगू़फा है. उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि वे इसे चाहे जितना उछालें, उन्हें ग़ैर मुस्लिम वोटों का बहुत फायदा नहीं होने वाला है, क्योंकि इस देश में रहने वाले, चाहे वे मुस्लिम समुदाय के लोग हों, दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हों या बहुसंख्यक हों, सभी लोग राजनीतिक दलों की चालों को थोड़ा-बहुत समझने लगे हैं. राजनीतिक भाषा का अर्थ उन्हें पता चल गया है. इससे स़िर्फ इतना हो सकता है कि छोटे तबक़ों को भरमा कर आप अख़बारों में बयान दिला सकते हैं, इससे ज़्यादा और कुछ नहीं हो सकता.
बहुत सारे हिस्सों में इस तरह के विचार चलाए जा रहे हैं कि यह मुल्क उनके लिए नहीं है, जो गांवों में रहते हैं. यह मुल्क किसानों, अल्पसंख्यकों या कमज़ोरों के लिए नहीं है. वे लोग इसलिए हैं, क्योंकि वे सरकारों को चुन रहे हैं. उनका कर्तव्य स़िर्फ वोट डालना है, वोट डालने के बाद उनकी ज़िंदगी सुधरी या नहीं सुधरी, इससे जीतने वालों को कोई मतलब नहीं रहता. यह भावना देश प्रेम की अवधारणा के खिला़फ है, पर यह बात इसलिए फैल रही है, क्योंकि बहुत सारे लोग जो मुल्क चलाते हैं, गंभीरता से सोचते नही हैं. अ़फसोस की बात यह है कि इधर जितने फैसले हुए, उनमें से ज़्यादातर ऐसे थे, जिन्हें देश के लोगों ने शंका की नज़र से देखा. एक अजीब संयोग है और दुर्भाग्य भी कि अगर आप अपना दर्द सरकार से बताने जाएं तो वह यह मानती है कि आप उसका विरोध कर रहे हैं. अपना दर्द बताने वाले चाहे मुसलमान हों, दलित हों, ग़रीब हों या अन्य वंचित लोग, सरकार उन्हें कब अपना दुश्मन मान ले, यह कहा नहीं जा सकता. यह अजीब सी चीज सरकार चलाने वालों के बीच पैदा हुई है. पहले जब लोग अपना दु:ख-दर्द कहते थे तो सरकार उस पर विचार करती थी, उसे दूर करने का उपाय बताती थी, लोगों से सुझाव आमंत्रित करती थी, पार्टी फोरम में उस पर बहस होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होता. अब अगर आप देश या ग़रीबों की बात करें तो सरकार और राजनीतिक दलों को लगता है कि आप उनका विरोध कर रहे हैं. इसे कहने या प्रकट करने में सरकार के लोगों को कोई संकोच भी नहीं होता. इसीलिए अब लोगों ने मंत्रियों या सरकारी अधिकारियों से शिकायतें करना बंद कर दिया है. मन ही मन कहीं घुटन हो रही है, कहीं ऊब हो रही है, कहीं लोग खुद को निराश महसूस कर रहे हैं. अब इन सब स्थितियों का हल या जिन्हें इनका सामना करना है, वे लोग सोए हुए हैं. वे ऐसी बातें करते हैं, जो ग़ैर ज़िम्मेदाराना होती हैं.
हमने यह विषय नए तरीक़े से इसलिए उठाया, क्योंकि यह विषय कुछ ऐसा है, जो ग़लत़फहमियां पैदा कर सकता है. अगर यह विषय हिंदू-मुसलमान के संदर्भ में देखा जाएगा तो इससे ग़लत़फहमियां पैदा होंगी, लेकिन यह विषय इस तरह देखा जाना चाहिए कि देश में रहने वाले, एक तरह के काम करने वाले, भले ही वे किसी भी धर्म के हों, उनकी समस्याएं एक हैं, आर्थिक स्थिति एक है, ग़रीबी-बीमारी-बेकारी एक है, तो अगर एक तबक़े को सुविधाएं मिलती हैं तो दूसरे तबक़े को क्यों नहीं मिल रही हैं? रंगनाथ मिश्र कमीशन यही कह रहा है कि अगर हिंदू दलितों को संरक्षण मिल रहा है तो मुस्लिम या ईसाई दलितों को संरक्षण क्यों नहीं मिल रहा है.
जस्टिस रंगनाथ मिश्र स्वयं उच्च जाति से आते हैं, लेकिन जब आप देश के बारे में फैसला कर रहे होते हैं तो न आपकी कोई जाति होती है, न आपका कोई धर्म होता है और न आप किसी के भाई या चाचा होते हैं. आप न्याय की कुर्सी पर होते हैं. शायद यही न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र ने किया. वह ऐसी कुर्सी पर थे, उन्हें एक ऐसी रिपोर्ट बनानी थी, जिसका आग्रह सुप्रीम कोर्ट ने किया था और जिसे सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के कहने पर टर्म ऑफ रेफरेंस में डाला था. उन्हें मालूम था कि अगर वह ग़लत स़िफारिशें करेंगे तो लोगों का विश्वास टूट जाएगा. इसलिए उन्होंने स़िफारिशें कीं, जिनका विरोध किसी राजनीतिक दल ने नहीं किया. जब किसी राजनीतिक दल ने इसका विरोध नहीं किया तो फिर क्यों सरकार ने इसे लोगों से छुपाए रखा और क्यों नहीं अब भी इन समस्याओं के समाधान के लिए सुझाए गए रास्तों पर वह अमल कर रही है. अगर सरकार अभी भी रंगनाथ मिश्र कमीशन द्वारा सुझाई गई सलाहों पर अमल करने का फैसला करे और लागू होने वाले क़दमों का ऐलान करे तो यह मानना चाहिए कि हम बहुत ज़्यादा निराशा के दौर में नहीं हैं. सरकार से यह आग्रह करना चाहिए, खासकर मुस्लिम संगठनों को आग्रह करना चाहिए कि सरकार रंगनाथ मिश्र कमीशन द्वारा की गई स़िफारिशों को लागू करने में देर न लगाए. पर यहां सवाल मुसलमानों के अपने बीच का भी है कि उनके अपने नेता, उनके संगठन इस कमीशन की स़िफारिशों को लागू करने के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठाते हैं. वे जितनी बहसें जस्टिस सच्चर द्वारा सुझाई गई स़िफारिशों पर करते हैं, उतनी गंभीरता के साथ रंगनाथ मिश्र कमीशन में सुझाई गई तस्वीर को क्यों नहीं देखते या उनके द्वारा सुझाए गए क़दमों पर बहस क्यों नहीं करते. इस सवाल का जवाब अगर किसी को देना है तो मुस्लिम संगठनों को ही देना है. मुस्लिम संगठनों से एक ही बात कह सकते हैं या सामान्य मुसलमानों से कि अगर आप खुद मांग नहीं करेंगे तो लोग आपके दरवाज़े पर आकर आपको खाना नहीं देंगे, आपकी इज्ज़त अ़फज़ाई नहीं करेंगे. इसलिए यह ज़रूरी है कि आप खुद रंगनाथ मिश्र कमीशन की स़िफारिशों को समयबद्ध तरीक़े से लागू करने के लिए सरकार पर दबाव डालें.